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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 46 Shloka 46 | गीता अध्याय 2 श्लोक 46 अर्थ सहित | यावानर्थ उदपाने सर्वतः…..

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 46 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 46 in Hindi): श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान का वह अनमोल ग्रंथ है, जो मानव जीवन के हर पहलू को सरल और सटीक तरीके से समझाता है। गीता का प्रत्येक श्लोक जीवन की किसी गूढ़ समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। श्लोक 2.46, गीता (Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 46) के ऐसे ही एक अद्भुत ज्ञान का भंडार है, जो हमें यह सिखाता है कि आत्म-साक्षात्कार से ही जीवन के सभी उद्देश्यों को पूर्ण किया जा सकता है। यह श्लोक न केवल वेदों के महत्व को बताता है, बल्कि उनके अंतिम उद्देश्य को भी स्पष्ट करता है।

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 46 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 46)

गीता अध्याय 2 श्लोक 46 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 46 in Hindi with meaning)

गीता अध्याय 2 श्लोक 46 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 46 in Hindi with meaning) | Festivalhindu.com
Gita Chapter 2 Sloka 46

श्लोक और उसका अर्थ

“यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।”

यावान् – जितना सारा; अर्थः – प्रयोजन होता है; उद-पाने – जलकूप में; सर्वतः – सभी प्रकार से; सम्लुप्त-उदके – विशाल जलाशय में; तावान् – उसी तरह; सर्वेषु – समस्त; वेदेषु – वेदों में; ब्राह्मणस्य – परब्रह्म को जानने वाले का; विजानतः – पूर्ण ज्ञानी का |

अनुवाद:
जैसे छोटे कुएं का सारा कार्य एक विशाल जलाशय से पूरा हो जाता है, वैसे ही वेदों के गूढ़ अर्थ को जानने वाले के लिए सभी वेदों का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है।

यह श्लोक जीवन के एक गहरे सत्य की ओर इशारा करता है। यदि कोई व्यक्ति वेदों के वास्तविक उद्देश्य और ज्ञान को समझ लेता है, तो उसे अनुष्ठानों और कर्मकांडों में उलझने की आवश्यकता नहीं रहती।


भावार्थ और तात्पर्य

भावार्थ:
श्लोक में यह बताया गया है कि जिस प्रकार एक विशाल जलाशय छोटे जलकूप का कार्य भी पूर्ण कर देता है, उसी प्रकार वेदों का आंतरिक तात्पर्य जानने वाले व्यक्ति के लिए वेदों में वर्णित समस्त अनुष्ठानों और कर्मकांडों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

तात्पर्य:
वेदों के कर्मकांड विभाग में वर्णित अनुष्ठान और यज्ञ, आत्म-साक्षात्कार के क्रमिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए हैं। आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है भगवान श्रीकृष्ण को जानना और उनके साथ अपने शाश्वत संबंध को समझना। गीता के पंद्रहवें अध्याय (15.15) में इसे स्पष्ट किया गया है कि वेदों का अंतिम लक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान प्राप्त करना है।

श्रीमद्भागवत (3.33.7) में इस पर जोर दिया गया है कि भगवान के पवित्र नाम का जाप करने वाला भले ही चाण्डाल जैसे निम्न परिवार में क्यों न उत्पन्न हुआ हो, किन्तु  वह आत्म-साक्षात्कार के सर्वोच्च पद पर स्थित होता है | वह व्यक्ति वैदिक अनुष्ठानों का पालन किए बिना ही उस उच्चतम स्थिति को प्राप्त कर सकता है, जो आत्मज्ञान का चरम उद्देश्य है।


आत्म-साक्षात्कार का महत्व

आत्म-साक्षात्कार वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व और भगवान के साथ अपने संबंध को पहचान लेता है। भगवद्गीता इस तथ्य पर बल देती है कि आत्म-साक्षात्कार से ही मोक्ष प्राप्ति संभव है।

  1. भगवद्गीता में आत्म-साक्षात्कार का वर्णन:
    • अध्याय 15, श्लोक 15: वेदों का उद्देश्य भगवान कृष्ण को जानना है।
    • अध्याय 15, श्लोक 7: सभी जीवात्माएँ भगवान का अंश हैं।
  2. आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग:
    • आत्म-साक्षात्कार व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है।
    • भगवान के साथ शाश्वत संबंध की अनुभूति कराता है।
  3. श्रीमद्भागवत का संदर्भ:
    “भगवान के नाम का जाप करने वाला व्यक्ति आत्मज्ञान के सर्वोच्च स्तर पर होता है। वह न केवल वैदिक अनुष्ठानों को पीछे छोड़ देता है, बल्कि वैदिक ज्ञान की पराकाष्ठा को भी प्राप्त कर लेता है।”

वर्तमान युग में श्लोक की प्रासंगिकता

आज का युग, जिसे कलियुग कहा गया है, में अधिकांश लोग वेदों और उनके कर्मकांडों का गहराई से अध्ययन करने में असमर्थ हैं। इसके कई कारण हैं:

  • समय की कमी
  • अनुष्ठानों की जटिलता
  • ज्ञान और साधन का अभाव

इस स्थिति में, गीता हमें एक सरल और प्रभावी उपाय प्रदान करती है – भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन।

भगवान चैतन्य महाप्रभु का दृष्टांत:
भगवान चैतन्य महाप्रभु ने इसे बहुत सरलता से समझाया। जब महान वैदिक पंडित प्रकाशानंद सरस्वती ने उनसे पूछा कि वे वेदांत दर्शन का अध्ययन क्यों नहीं करते, तो उन्होंने उत्तर दिया:
“मेरे गुरु ने मुझे मुर्ख समझा और कहा कि भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करो।”
इससे स्पष्ट होता है कि नाम-स्मरण और कीर्तन आत्म-साक्षात्कार का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है।


श्लोक 2.46 से जीवन की सीख

  1. वेदों के उद्देश्य को समझें:
    • कर्मकांडों में उलझने के बजाय वेदों के गहरे अर्थ को जानने का प्रयास करें।
  2. आत्म-साक्षात्कार को प्राथमिकता दें:
    • अपने अस्तित्व और भगवान के साथ अपने संबंध को पहचानें।
  3. भगवन्नाम का महत्व:
    • भगवान के नाम का स्मरण करने से मोक्ष और आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
  4. सरलता से भक्ति:
    • जटिल अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं, केवल समर्पण और भक्ति पर्याप्त है।

निष्कर्ष: वैदिक ज्ञान का सार

गीता का श्लोक 2.46 हमें यह सिखाता है कि वेदों का अंतिम उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान प्राप्त करना है। यह श्लोक न केवल हमें वेदों के गूढ़ रहस्यों को समझने की प्रेरणा देता है, बल्कि यह भी बताता है कि भक्ति और भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन ही मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है।

Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस

अध्याय 2 (Chapter 2)

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