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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 33 Shloka 33 | गीता अध्याय 2 श्लोक 33 अर्थ सहित | अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं…..

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 33 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 33 in Hindi): भगवद गीता के श्लोक 2.33(Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 33) में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उसके कर्तव्य के प्रति जागरूक किया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाया कि उसका धर्म एक योद्धा का है, और इस धर्म का पालन करना उसकी जिम्मेदारी है। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण ने केवल अर्जुन को ही नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति को यह सिखाया है कि जीवन में अपने कर्तव्यों का निर्वाहन अत्यंत आवश्यक है। यदि हम अपने कर्तव्य से विमुख होते हैं तो न केवल हमारे जीवन का उद्देश्य समाप्त हो जाता है, बल्कि हम पाप के भागी बन जाते हैं।

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 33 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 33)

गीता अध्याय 2 श्लोक 33 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 33 in Hindi with meaning)

गीता अध्याय 2 श्लोक 33 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 33 in Hindi with meaning) | Festivalhindu.com
Gita Chapter 2 Verse 33

श्लोक 2.33 और उसका अर्थ

श्लोक:

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि |
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || ३३ ||

अथ – अतः; चेत् – यदि; त्वम् – तुम; इमम् – इस; धर्म्यम् – धर्म रूपी; संग्रामम् – युद्ध को; न – नहीं; करिष्यसि – करोगे; ततः – तब; स्व-धर्मम् – अपने धर्म को; कीर्तिम् – यश को; च – भी; हित्वा – खोकर; पापम् – पापपूर्ण फल को; अवाप्स्यसि – प्राप्त करोगे |

अनुवाद:
यदि तुम इस धर्मरूपी संग्राम को नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और यश को खोकर पापपूर्ण परिणाम का सामना करोगे।

शाब्दिक अर्थ:
यदि तुम इस धर्मरूपी संग्राम को नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और यश को खोकर पापपूर्ण परिणाम का सामना करोगे।

इस श्लोक में ‘अथ’ का अर्थ है ‘किन्तु’, ‘चेत’ का अर्थ ‘यदि’ और ‘इमं धर्म्यम् संग्रामं’ का अर्थ है ‘इस धर्मरूपी युद्ध को’। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि वह अपने क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं करेगा और इस धर्म संग्राम को नहीं लड़ेगा, तो उसे अपने धर्म और यश का त्याग करना पड़ेगा और वह पाप का भागी बनेगा।

भावार्थ: धर्म का पालन और यश की प्राप्ति

इस श्लोक के भावार्थ में भगवान अर्जुन को उसके धर्म की महत्ता का बोध कराते हैं। अर्जुन एक क्षत्रिय है, और उसका कर्तव्य है कि वह अधर्म के खिलाफ लड़ाई लड़े। युद्ध करना उसके स्वधर्म का हिस्सा है, जिसे त्यागना उसे पाप की ओर ले जाएगा। अर्जुन के पास महान योद्धा बनने का गौरव है, लेकिन अगर वह इस युद्ध से भागता है, तो उसकी कीर्ति और यश दोनों समाप्त हो जाएंगे। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह एहसास दिला रहे हैं कि अपने कर्तव्य से भागना उसे अज्ञात पाप का दोषी बना देगा।

मुख्य बातें:

  • धर्म का पालन: अर्जुन का मुख्य कर्तव्य धर्मरूपी संग्राम में भाग लेना है।
  • यश की हानि: युद्ध से पीछे हटने पर अर्जुन का यश समाप्त हो जाएगा।
  • पाप का परिणाम: अपने कर्तव्य का पालन न करने पर अर्जुन को पाप का भागी बनना पड़ेगा।

तात्पर्य: अर्जुन का स्वधर्म और यश

अर्जुन अपने समय का एक महान योद्धा था, जिसने कई युद्धों में अपनी वीरता दिखाई थी। शिवजी से युद्ध कर पाशुपतास्त्र प्राप्त करना, गुरु द्रोणाचार्य से आशीर्वाद प्राप्त करना, और अन्य देवताओं से अनेक युद्ध करना – अर्जुन की वीरता का प्रमाण था। अर्जुन को उसकी वीरता के कारण सम्मान मिला था, लेकिन यदि वह इस महायुद्ध से पीछे हट जाता है, तो न केवल उसका सम्मान समाप्त हो जाएगा, बल्कि वह अपने धर्म का उल्लंघन करने का दोषी भी बन जाएगा।

अर्जुन के लिए यह एक बड़ा संकट था – यदि वह युद्ध से पीछे हटता है, तो वह अपने धर्म का अपमान करेगा और उसका यश भी नष्ट हो जाएगा। इसी कारण, भगवान श्रीकृष्ण ने उसे यह समझाने का प्रयास किया कि युद्ध न करने का परिणाम उसके लिए पापपूर्ण होगा और उसे अपयश भी मिलेगा।

मुख्य बिंदु:

  • अर्जुन का यश उसके कर्तव्यों के प्रति उसकी निष्ठा का प्रमाण था।
  • स्वधर्म का पालन न करने पर यश की हानि निश्चित है।
  • युद्ध से पलायन का अर्थ है पाप का भागी बनना और नरक की ओर अग्रसर होना।

श्लोक का सार: युद्ध से पलायन और पाप

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि उसका कर्तव्य युद्ध करना है और उससे पीछे हटना पापपूर्ण होगा। जीवन में कर्तव्यों का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, अन्यथा हमारी कीर्ति और सम्मान समाप्त हो सकते हैं। श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट कर दिया कि युद्ध करना अर्जुन का धर्म है और उससे पीछे हटना केवल अपने धर्म और यश का परित्याग करना ही नहीं, बल्कि पाप का भागी बनना है।

इस श्लोक से यह शिक्षा मिलती है कि अपने कर्तव्य से पीछे हटने का परिणाम अत्यंत घातक हो सकता है। यह संदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि हम सभी के लिए है। हमें यह समझना चाहिए कि जीवन में अपने कर्तव्यों का पालन करना हमारे लिए अनिवार्य है।


निष्कर्ष: कर्तव्य के प्रति जागरूकता

भगवद गीता का यह श्लोक हमें अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहने का संदेश देता है। यदि हम अपने कर्तव्य से विमुख होते हैं, तो हमारी पहचान, सम्मान, और यश का ह्रास हो सकता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि जीवन में अपने धर्म का पालन करके ही हम सच्चे यश और मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।

अतः, श्लोक 2.33 हमें यह सिखाता है कि धर्म और कर्तव्य का पालन ही जीवन का सही मार्ग है, और कर्तव्य से विमुख होकर हम पाप के मार्ग की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस

अध्याय 2 (Chapter 2)

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