You are currently viewing Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31 Shloka 31 | गीता अध्याय 2 श्लोक 31 अर्थ सहित | स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न…..

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31 Shloka 31 | गीता अध्याय 2 श्लोक 31 अर्थ सहित | स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न…..

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 31 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31 in Hindi): भगवद गीता का दूसरा अध्याय, ‘सांख्य योग’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके जीवन के महत्वपूर्ण क्षण में मार्गदर्शन देते हैं। गीता के श्लोक 2.31(Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 31) में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्वधर्म का पालन करने और धर्म के लिए युद्ध में संकोच न करने का उपदेश दिया है। यह श्लोक हमें न केवल कर्म के महत्व का बोध कराता है, बल्कि यह भी समझाता है कि स्वधर्म का पालन करना व्यक्ति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। विशेष रूप से, जब वह धर्म और न्याय की स्थापना के लिए होता है। इस लेख में हम श्लोक 2.31 का गहराई से विश्लेषण करेंगे और इसके महत्व को समझेंगे।

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 31 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31)

गीता अध्याय 2 श्लोक 31 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 31 in Hindi with meaning)

गीता अध्याय 2 श्लोक 31 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 31 in Hindi with meaning) | Festivalhindu.com
Gita Chapter 2 Verse 31 in Hindi

श्लोक 2.31 का पाठ और भावार्थ


श्लोक:
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयो न्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।। ३१।।

शब्दार्थ:

  • स्व-धर्मम्: अपने धर्म को
  • अवेक्ष्य: विचार करके
  • न विकम्पितुम: संकोच करने के लिए
  • अर्हसि: तुम योग्य हो
  • धर्म्यात् युद्धात्: धर्म के लिए युद्ध
  • क्षत्रियस्य: क्षत्रिय का
  • श्रेयः: श्रेष्ठ साधन
  • विद्यते: है

क्षत्रिय होने के नाते अपने विशिष्ट धर्म का विचार करते हुए तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म के लिए युद्ध करने से बढ़ कर तुम्हारे लिए अन्य कोई कार्य नहीं है | अतः तुम्हें संकोच करने की कोई आवश्यकता नहीं है |

भावार्थ:


भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, “हे अर्जुन! अपने स्वधर्म का विचार करके तुम इस धर्म युद्ध में संकोच नहीं करो। धर्म की रक्षा के लिए युद्ध से बढ़कर कोई और कर्तव्य क्षत्रिय के लिए नहीं हो सकता। इसलिए तुम्हें इस धर्म युद्ध में बिना किसी हिचक के सम्मिलित होना चाहिए।”

स्वधर्म का महत्व


भगवद गीता में स्वधर्म का विशेष महत्व है। स्वधर्म का तात्पर्य उस धर्म से है, जो व्यक्ति की जाति, कर्म, और समाज में उसकी स्थिति के अनुसार निर्धारित होता है। यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ नैतिक और सामाजिक कर्तव्यों से है। प्रत्येक व्यक्ति का एक विशिष्ट कर्तव्य होता है, जो उसके जीवन में सफलता और आत्मिक संतोष का मार्ग प्रशस्त करता है। अर्जुन के लिए, स्वधर्म क्षत्रिय होने के नाते युद्ध करना था। क्षत्रिय का धर्म समाज की रक्षा करना, अत्याचारों का अंत करना और न्याय की स्थापना करना होता है। इस प्रकार, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाने का प्रयास किया कि धर्म के मार्ग पर चलते हुए युद्ध से पीछे हटना अधर्म होगा।

क्षत्रिय धर्म और उसका पालन


क्षत्रिय धर्म का पालन अत्यधिक साहस और बलिदान की मांग करता है। क्षत्रिय समाज की व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उनका कार्य न केवल शारीरिक बल का प्रयोग करना था, बल्कि समाज में न्याय और शांति की स्थापना करना भी था। उन्हें युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने का प्रशिक्षण दिया जाता था। यह उनके जीवन का मुख्य कर्तव्य होता था। इस श्लोक में, श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि धर्म के लिए युद्ध करना न केवल क्षत्रियों का स्वधर्म है, बल्कि यह उनके जीवन का सर्वोच्च कार्य है।

धर्मयुद्ध का महत्व


धर्मयुद्ध का उद्देश्य केवल भौतिक विजय प्राप्त करना नहीं होता, बल्कि यह आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण होता है। शास्त्रों में धर्मयुद्ध की महत्ता का उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है। गीता में भी इसे एक यज्ञ के रूप में देखा गया है। जिस प्रकार यज्ञ में दी जाने वाली आहुति से आत्मा की शुद्धि होती है, उसी प्रकार धर्मयुद्ध में दिया गया बलिदान समाज की शुद्धि का प्रतीक होता है। यह यज्ञ और युद्ध दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है कि वे धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए होते हैं।

हिंसा और धर्म


धर्म के लिए की गई हिंसा को धर्म ग्रंथों में हिंसा नहीं माना जाता। यह एक आवश्यक और अनिवार्य कर्तव्य होता है, जो समाज और धर्म की रक्षा के लिए किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि धर्मयुद्ध में मारे गए योद्धा स्वर्ग की प्राप्ति करते हैं, जैसे कि यज्ञ में बलि दिए गए पशु को स्वर्गलोक प्राप्त होता है। इसलिए, धर्मयुद्ध में लड़ा गया युद्ध केवल शारीरिक संघर्ष नहीं होता, बल्कि यह आत्मा की उन्नति का साधन भी होता है।

स्वधर्म के प्रकार


स्वधर्म मुख्यतः दो प्रकार का होता है:

  1. शारीरिक स्वधर्म: यह वह कर्तव्य है, जो व्यक्ति को उसके शरीर और समाज में उसकी स्थिति के अनुसार निभाना होता है। अर्जुन के लिए यह स्वधर्म क्षत्रिय के रूप में युद्ध करना था। यह कर्तव्य समाज की शांति और सुरक्षा के लिए होता है। जब तक व्यक्ति शारीरिक स्तर पर है, तब तक उसे अपने सामाजिक कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक होता है।
  2. आध्यात्मिक स्वधर्म: जब व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है और मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है, तो उसका स्वधर्म आध्यात्मिक हो जाता है। यह देहात्मबुद्धि से परे होता है। उस स्थिति में व्यक्ति का स्वधर्म आत्मा की उन्नति और ईश्वर की प्राप्ति के लिए होता है।

अहिंसा और कूटनीति


राजनीति में अहिंसा को कई बार एक कूटनीतिक चाल के रूप में प्रयोग किया जाता है, लेकिन धर्मयुद्ध में यह सिद्धांत नहीं चलता। क्षत्रियों का कार्य ही धर्म की रक्षा के लिए लड़ना होता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह स्पष्ट कर दिया कि जब धर्म की स्थापना और न्याय की रक्षा की बात आती है, तो हिंसा से पीछे हटना अनुचित है। इसलिए, धर्मयुद्ध में संकोच करना क्षत्रिय के धर्म के विरुद्ध है।

श्लोक 2.31 से शिक्षा


श्लोक 2.31 हमें यह सिखाता है कि:

  • स्वधर्म का पालन करना व्यक्ति का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
  • क्षत्रियों के लिए धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना महत्वपूर्ण है।
  • युद्ध केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी होता है, जिसमें व्यक्ति अपने संकोच और भय से लड़ता है।
  • धर्मयुद्ध से समाज की शुद्धि होती है और यह आत्मा की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

निष्कर्ष


भगवद गीता का यह श्लोक हमें अपने कर्तव्यों का निर्वाह बिना किसी भय और संकोच के करने का उपदेश देता है। स्वधर्म का पालन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलने से व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में सफल होता है, बल्कि समाज में भी न्याय और धर्म की स्थापना करता है। क्षत्रिय धर्म का पालन समाज की रक्षा और न्याय की स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाया कि धर्म के लिए युद्ध करना केवल उनका कर्तव्य नहीं, बल्कि उनका सबसे बड़ा धर्म है।

Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस

अध्याय 2 (Chapter 2)

123456
789101112
131415161718
192021222324
252627282930
313233343536
373839404142
434445464748
495051525354
555657585960
616263646566
676869707172

Leave a Reply