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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 28 Shloka 28 | गीता अध्याय 2 श्लोक 28 अर्थ सहित अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि…..

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 28 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 28 in Hindi): इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन और मृत्यु के सत्य से अवगत कराते हैं। वे कहते हैं कि सारे जीव पहले अव्यक्त (अदृश्य) अवस्था में रहते हैं, फिर वे जन्म लेकर व्यक्त (दृश्य) होते हैं, और मृत्यु के बाद पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि जीवन का प्रारंभ और अंत दोनों ही अव्यक्त होते हैं, जबकि जन्म से मृत्यु के बीच का समय व्यक्त होता है। इसलिए इस चक्र के लिए शोक करने का कोई कारण नहीं है।

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 28 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 28)

गीता अध्याय 2 श्लोक 28 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Shloka 28 in Hindi with meaning)

गीता अध्याय 2 श्लोक 28 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Shloka 28 in Hindi with meaning) | Festivalhindu.com
Gita Chapter 2 Verse 28 in Hindi

श्लोक:
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || २८ ||

शब्दार्थ:

  • अव्यक्त-आदीनि – प्रारम्भ में अप्रकट
  • भूतानि – सारे प्राणी
  • व्यक्त – प्रकट
  • मध्यानि – मध्य में
  • भारत – हे भरतवंशी
  • अव्यक्त – अप्रकट
  • निधनानि – विनाश होने पर
  • एव – इस तरह से
  • तत्र – अतः
  • का – क्या
  • परिदेवना – शोक

सारे जीव प्रारम्भ में अव्यक्त रहते हैं, मध्य अवस्था में व्यक्त होते हैं और विनष्ट होने पर पुनः अव्यक्त हो जाते हैं | अतः शोक करने की क्या आवश्यकता है?


भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन और मृत्यु के सत्य से अवगत कराते हैं। वे कहते हैं कि सारे जीव पहले अव्यक्त (अदृश्य) अवस्था में रहते हैं, फिर वे जन्म लेकर व्यक्त (दृश्य) होते हैं, और मृत्यु के बाद पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि जीवन का प्रारंभ और अंत दोनों ही अव्यक्त होते हैं, जबकि जन्म से मृत्यु के बीच का समय व्यक्त होता है। इसलिए इस चक्र के लिए शोक करने का कोई कारण नहीं है।

तात्पर्य

इस श्लोक का सार यही है कि जीवन और मृत्यु दोनों एक स्वाभाविक प्रक्रिया हैं। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन के मन में व्याप्त शोक और मोह को दूर करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं। चाहे हम आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करते हों या न करते हों, किसी भी स्थिति में शोक का कोई कारण नहीं है। इस सत्य को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं:

जीवन और मृत्यु का प्राकृतिक चक्र

श्रीकृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से जीवन और मृत्यु के प्राकृतिक चक्र की व्याख्या की है। उन्होंने बताया कि संसार के सभी प्राणी, जो हमें दिखाई देते हैं, वे पहले अदृश्य अवस्था में होते हैं। समय के साथ, वे जन्म लेते हैं और हमारे सामने प्रकट होते हैं। जब उनका शरीर समाप्त हो जाता है, तो वे फिर से अदृश्य हो जाते हैं।

  • अदृश्य से दृश्य की यात्रा:
    जीवन की शुरुआत अदृश्य अवस्था में होती है। इसके बाद, जन्म के समय, जीवन दृश्य होता है। अंत में, मृत्यु के बाद वह फिर से अदृश्य हो जाता है। यह एक ऐसा चक्र है जो सृष्टि के सभी प्राणियों के लिए समान है।
  • भौतिक तत्वों का रूपांतरण:
    इस प्रक्रिया को समझने के लिए हम भौतिक तत्वों की उत्पत्ति को देख सकते हैं। जैसे:
    • आकाश से वायु उत्पन्न होती है।
    • वायु से अग्नि उत्पन्न होती है।
    • अग्नि से जल उत्पन्न होता है।
    • जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है।
    • पृथ्वी से अनेक प्रकार के पदार्थ उत्पन्न होते हैं।
      यह प्रक्रिया हमें यह समझने में मदद करती है कि अदृश्य अवस्था से दृश्य अवस्था और फिर से अदृश्य अवस्था में लौटना एक प्राकृतिक नियम है।

आत्मा और शरीर का संबंध

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह भी समझाते हैं कि आत्मा और शरीर के बीच का संबंध क्या है। शरीर नाशवान है जबकि आत्मा शाश्वत और अजर-अमर है। जब शरीर का अंत होता है, तब भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है।

  • शरीर वस्त्र समान है:
    श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा के लिए शरीर एक वस्त्र के समान है। जिस प्रकार हम पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करते हैं, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करती है। इसलिए शरीर के नाश के लिए शोक करना व्यर्थ है।
  • शाश्वत आत्मा:
    आत्मा का नाश नहीं होता है। वह सदा रहती है, केवल शरीर के रूप में उसका प्रकट और अप्रकट होना होता है। इस दृष्टिकोण से, मृत्यु केवल शरीर का त्याग है, आत्मा का नहीं। इसलिए शरीर के नाश के लिए शोक करना उचित नहीं है।
  • स्वप्न के समान शरीर:
    भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर की तुलना स्वप्न से की है। जिस प्रकार स्वप्न में हम कई प्रकार के दृश्य देखते हैं—जैसे हम राजमहल में हों या आकाश में उड़ रहे हों—लेकिन जागने पर हमें समझ में आता है कि वह केवल एक भ्रम था। उसी प्रकार, भौतिक शरीर भी एक स्वप्न के समान है, जिसका वास्तविकता में कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है।

शोक और मोह से मुक्ति

श्रीकृष्ण का यह उपदेश अर्जुन को शोक और मोह से मुक्त करने के लिए है। युद्ध के मैदान में अपने सगे-संबंधियों के नाश की कल्पना से अर्जुन शोकग्रस्त थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें इस शाश्वत सत्य से अवगत कराया कि जीवन और मृत्यु का यह चक्र अवश्यंभावी है।

  • दार्शनिक दृष्टिकोण:
    दो प्रकार के दार्शनिक दृष्टिकोण होते हैं—एक वह जो आत्मा के अस्तित्व को मानते हैं और दूसरा जो आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानते। यहाँ भगवान कहते हैं कि चाहे आप किसी भी दृष्टिकोण से देखें, किसी भी स्थिति में शोक का कोई कारण नहीं है।
  • भौतिक तत्त्वों का परिवर्तन:
    जिस प्रकार पृथ्वी से विशाल महल बनता है और फिर उसके विनाश पर वह पृथ्वी में समा जाता है, उसी प्रकार सारे भौतिक तत्त्व समय के साथ प्रकट और अप्रकट होते रहते हैं। इसलिए किसी वस्तु के नाश या अदृश्य हो जाने पर शोक करना व्यर्थ है।

निष्कर्ष

श्रीकृष्ण का यह श्लोक हमें जीवन और मृत्यु के सच्चे स्वरूप को समझने की प्रेरणा देता है। यह हमें बताता है कि शरीर का नाश निश्चित है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। जीवन और मृत्यु की इस प्रक्रिया को समझकर हमें अपने जीवन में शोक और मोह को स्थान नहीं देना चाहिए।

  • आध्यात्मिक दृष्टिकोण:
    इस श्लोक का आध्यात्मिक दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि हमें आत्मा के शाश्वत स्वरूप को पहचानना चाहिए और भौतिक शरीर के नाश के प्रति उदासीन रहना चाहिए।
  • जीवन की दिशा:
    इस शाश्वत सत्य को समझकर हम अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकते हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य केवल शरीर को ही तुष्ट करना नहीं होना चाहिए, बल्कि आत्मा की उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।
  • शोक से मुक्ति:
    अगर हम इस श्लोक के संदेश को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हम जीवन में आने वाले दुखों और परेशानियों को शांति से स्वीकार कर सकते हैं। यह हमें एक व्यापक दृष्टिकोण देता है, जिससे हम जीवन की कठिनाइयों में भी संतुलित रह सकते हैं।

इस प्रकार, श्लोक 2.28 हमें यह सिखाता है कि जीवन की अस्थिरता और अनिश्चितता को स्वीकार करना चाहिए और शाश्वत सत्य को पहचानकर शोक और मोह से मुक्त होना चाहिए।

Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस

अध्याय 2 (Chapter 2)

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