श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 24 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 24 in Hindi): भगवद गीता का श्लोक 2.24(Bhagavad Gita Shloka 2.24) आत्मा की शाश्वत और अविनाशी प्रकृति को उजागर करता है। यह श्लोक हमें बताता है कि आत्मा अद्वितीय है और इसे न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही किसी भी प्रकार से बदला जा सकता है। यह आत्मा के शाश्वत अस्तित्व की गहरी समझ प्रदान करता है। आइए, इस श्लोक के अर्थ और तात्पर्य को गहराई से जानें।
श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 24 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 24)
श्लोक 2 . 24
Bhagavad Gita Chapter 2 Verse-Shloka 24
अच्छेद्योSयमदाह्योSयमक्लेद्योSशोष्य एव च |
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोSयं सनातनः || २४ ||
गीता अध्याय 2 श्लोक 24 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 24 in Hindi with meaning)

श्लोक 2.24:
अच्छेद्योSयमदाह्योSयमक्लेद्योSशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोSयं सनातनः॥
अर्थ:
यह आत्मा अखंडित है, इसे तोड़ा नहीं जा सकता। इसे न जलाया जा सकता है, न गीला किया जा सकता है, और न ही सुखाया जा सकता है। यह आत्मा शाश्वत, सर्वव्यापी, अविकारी, स्थिर और सनातन है। यह सदैव एक सा रहने वाला है और किसी भी भौतिक तत्व से प्रभावित नहीं होता।
श्लोक का शब्दार्थ:
- अच्छेद्यः – न टूटने वाला
- अदाह्यः – न जलाया जा सकने वाला
- अक्लेद्यः – न गीला किया जा सकने वाला
- अशोष्यः – न सुखाया जा सकने वाला
- नित्यः – शाश्वत
- सर्वगतः – सर्वव्यापी
- स्थाणुः – अपरिवर्तनीय
- अचलः – स्थिर
- सनातनः – सदैव एक जैसा रहने वाला
भावार्थ:
भगवद गीता के इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा का स्वरूप नितांत अविनाशी है। इसे किसी भी भौतिक शक्ति से नष्ट नहीं किया जा सकता। चाहे वह आग हो, पानी हो, हवा हो, या कोई अन्य प्राकृतिक तत्व—आत्मा इन सभी से अप्रभावित रहती है। आत्मा के ये गुण हमें यह सिखाते हैं कि यह शरीर नष्ट हो सकता है, लेकिन आत्मा शाश्वत और अजर-अमर है। यह आत्मा सर्वव्यापी है, जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त रहती है। इसे कोई भी शक्ति न बदल सकती है और न ही प्रभावित कर सकती है।
श्लोक का गहन विश्लेषण:
श्लोक 2.24 आत्मा के महत्वपूर्ण गुणों को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है। आत्मा को न तो तोड़ा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न गीला किया जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है। इस श्लोक के माध्यम से आत्मा की अमरता और शाश्वतता को समझाया गया है। यह भौतिक शरीर, जो नश्वर है, आत्मा के ठीक विपरीत है। आत्मा का स्वरूप शुद्ध और अपरिवर्तनीय है, जो किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलता।
इस श्लोक में आत्मा के निम्नलिखित गुणों पर प्रकाश डाला गया है:
- अविनाशी: आत्मा को किसी भी प्रकार से नष्ट नहीं किया जा सकता। चाहे वह शस्त्र हो या आग, कोई भी भौतिक शक्ति आत्मा को क्षति नहीं पहुँचा सकती।
- अपरिवर्तनीय: आत्मा में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। यह सदैव एक जैसा रहता है। यह एक अणु के रूप में है, जो कभी भी अपनी प्रकृति नहीं बदलता। चाहे शरीर किसी भी अवस्था में हो, आत्मा अपनी मौलिकता को बनाए रखती है।
- सर्वव्यापी: आत्मा हर जगह विद्यमान है। यह सभी जीवों के अंदर निवास करती है और यह ब्रह्मांड के प्रत्येक कोने में व्याप्त है। जल, थल, वायु, अग्नि या कोई भी तत्व आत्मा की उपस्थिति से अछूता नहीं है।
- स्थिर और स्थायी: आत्मा की स्थिति स्थिर है। इसे किसी भी परिस्थिति से हिलाया या बदला नहीं जा सकता। यह न केवल अविचलित है, बल्कि सनातन है। इसका कोई अंत नहीं है और यह हमेशा अपने स्वरूप में बनी रहती है।
- सनातन: आत्मा अनादि और अनंत है। इसका कोई आरंभ या अंत नहीं है। यह जीवन के चक्र में हमेशा बनी रहती है और जन्म और मृत्यु से परे है।
तात्पर्य:
श्लोक 2.24 आत्मा की शाश्वतता और उसकी परमात्मा से जुड़ी विशेषताओं पर प्रकाश डालता है। यहाँ आत्मा को अणु-आत्मा कहा गया है, जो परमात्मा का अंश है। यह श्लोक अद्वैतवाद की कुछ धारणाओं को चुनौती देता है, जहाँ अणु-आत्मा और परमात्मा के बीच कोई एकता नहीं होती। इस श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि अणु-आत्मा और परमात्मा एक नहीं हो सकते।
आत्मा स्वतंत्र है और अपनी मौलिकता को बनाए रखती है। परमात्मा की तुलना में आत्मा बहुत छोटी है, लेकिन इसका अस्तित्व अनंत और अविनाशी है। आत्मा को नष्ट नहीं किया जा सकता, और यह भौतिक जगत के तत्वों से भी परे है।
इस श्लोक में “सर्वगत” शब्द भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो यह सिद्ध करता है कि आत्मा पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। आत्मा का अस्तित्व सूर्यलोक जैसे स्थानों पर भी हो सकता है। यह धारणा कि सूर्य में जीव नहीं हो सकते, इस श्लोक के अनुसार गलत है। आत्मा सर्वव्यापी और शाश्वत है, जो हर तत्व में मौजूद है।
महत्त्वपूर्ण बिंदु:
- आत्मा अविनाशी है और इसे किसी भी भौतिक साधन से नष्ट नहीं किया जा सकता।
- यह सर्वव्यापी है और हर जीव के भीतर विद्यमान रहती है।
- आत्मा का स्वरूप स्थिर और अपरिवर्तनीय है।
- आत्मा की प्रकृति शाश्वत और सनातन है, यह जन्म और मृत्यु से परे है।
- “सर्वगत” शब्द यह दर्शाता है कि आत्मा सभी जगहों पर उपस्थित है, चाहे वह अग्नि, वायु, या जल हो।
निष्कर्ष:
भगवद गीता का श्लोक 2.24 आत्मा की अनंतता और शाश्वतता को समझाने का महत्वपूर्ण प्रयास है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आत्मा अविनाशी है और इसे किसी भी प्रकार से नष्ट नहीं किया जा सकता। चाहे यह शरीर नष्ट हो जाए, आत्मा सदैव जीवित रहती है। आत्मा का स्वरूप शुद्ध, अपरिवर्तनीय और अजर-अमर है। आत्मा की यह गहरी समझ हमारे जीवन के उद्देश्यों और मूल्यों को स्पष्ट करती है, जो हमें जीवन की भौतिकता से परे आत्मज्ञान की ओर ले जाती है।
Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस