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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23 Shloka 23 | गीता अध्याय 2 श्लोक 23 अर्थ सहित | नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं…..

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 23 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23 in Hindi): भगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 23(bhagwat gita chapter 2 shloka 23) में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा के अमर और अजर-अमर स्वरूप के बारे में बताया है। इस श्लोक में आत्मा के उस अद्वितीय गुण की व्याख्या की गई है जिसे कोई भौतिक तत्व नष्ट नहीं कर सकता। यह श्लोक जीवन के गहरे आध्यात्मिक सत्य को उजागर करता है।

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 23 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23)

गीता अध्याय 2 श्लोक 23 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 23 in Hindi with meaning)

गीता अध्याय 2 श्लोक 23 अर्थ सहित (Gita Chapter 2 Verse 23 in Hindi with meaning) | Festivalhindu.com
Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23 in Sanskrit

आत्मा की अविनाशी शक्ति: श्लोक 2.23 का गूढ़ अर्थ

श्लोक:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः || २३ ||

श्लोक का भावार्थ

न – कभी नहीं; एनम् – इस आत्मा को; छिन्दन्ति – खण्ड-खण्ड कर सकते हैं; शस्त्राणि – हथियार; न – कभी नहीं; एनम् – इस आत्मा को; दहति – जला सकता है; पावकः – अग्नि; न – कभी नहीं; च – भी; एनम् – इस आत्मा को; क्लेदयन्ति – भिगो सकता है; आपः – जल; न – कभी नहीं; शोषयति – सुखा सकता है; मारुतः – वायु |

यह श्लोक भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का हिस्सा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन, मृत्यु और आत्मा के वास्तविक स्वरूप के बारे में गहन ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। श्लोक 2.23 आत्मा की अविनाशी प्रकृति पर केंद्रित है, जिसे न तो किसी शस्त्र से काटा जा सकता है, न अग्नि से जलाया जा सकता है, न जल से भिगोया जा सकता है और न ही वायु से सुखाया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि आत्मा भौतिक जगत की किसी भी शक्ति के अधीन नहीं है और यह सदा के लिए अजर-अमर रहती है।


आत्मा का शाश्वत स्वरूप

श्लोक 2.23 में श्रीकृष्ण ने आत्मा के शाश्वत और अमर स्वरूप को स्पष्ट किया है। वे अर्जुन को यह बता रहे हैं कि जो आत्मा है, वह किसी भी प्रकार के भौतिक हथियार या शक्ति से प्रभावित नहीं होती। आत्मा का यह शाश्वत स्वरूप अद्वितीय और स्थायी है। यह न तो किसी भौतिक तत्व के द्वारा नष्ट की जा सकती है और न ही किसी प्रक्रिया द्वारा समाप्त हो सकती है। आत्मा सदा के लिए स्थायी है, और यह शरीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहती है।

यह विचार मानव जीवन के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारी पहचान आत्मा से है, न कि शरीर से। शरीर का नाश निश्चित है, पर आत्मा का कभी नाश नहीं होता। श्रीकृष्ण हमें यह याद दिलाते हैं कि हम केवल इस अस्थायी भौतिक शरीर से अधिक हैं।


आत्मा की अजेयता

श्रीकृष्ण के अनुसार, आत्मा को न तो काटा जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न भिगोया जा सकता है और न सुखाया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि आत्मा सभी प्रकार की भौतिक और प्राकृतिक शक्तियों से परे है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख किया गया है कि आत्मा को शस्त्र, अग्नि, जल और वायु जैसी प्राकृतिक शक्तियों से नष्ट नहीं किया जा सकता। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आत्मा अजर-अमर है और इसे किसी भी बाहरी शक्ति से हानि नहीं पहुँचाई जा सकती।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, हमारे पास अत्यधिक शक्तिशाली हथियार हैं जो भौतिक शरीर को नष्ट कर सकते हैं, परंतु आत्मा अछूती रहती है। चाहे वह तलवार हो, अग्नि हो, जल हो या वायु, आत्मा पर किसी भी तत्व का प्रभाव नहीं पड़ता।

श्लोक 2.23 की ये पंक्तियाँ आत्मा की अमरता की सच्चाई को सामने लाती हैं:

  • शस्त्राणि नैनं छिन्दन्ति – आत्मा को किसी भी हथियार से काटा नहीं जा सकता।
  • नैनं दहति पावकः – आत्मा को अग्नि भी नष्ट नहीं कर सकती।
  • न चैनं क्लेदयन्त्यापः – जल इसे भिगो नहीं सकता।
  • न शोषयति मारुतः – वायु इसे सुखा नहीं सकता।

यह सब इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि आत्मा भौतिक तत्वों से प्रभावित नहीं होती। शरीर तो नष्ट हो सकता है, पर आत्मा अजर और अमर है।


आत्मा और विज्ञान

यदि हम आत्मा की अवधारणा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो हम पाएंगे कि यह भौतिक विज्ञान से परे है। आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक वस्तुओं और प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है, लेकिन आत्मा एक आध्यात्मिक तत्व है जो विज्ञान के नियमों से परे है। यहाँ तक कि वैज्ञानिक हथियार, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, आत्मा को हानि नहीं पहुँचा सकते।

श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मा किसी भी वैज्ञानिक या भौतिक शक्ति से नष्ट नहीं हो सकती। यह संदेश हमें यह सिखाता है कि आत्मा का अस्तित्व अद्वितीय और शाश्वत है। चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, आत्मा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।


आत्मा और मायावाद

मायावाद के सिद्धांत के अनुसार, आत्मा और ब्रह्म (परमात्मा) एक ही हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। परंतु इस श्लोक के अनुसार, आत्मा और परमात्मा अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं। जीवात्मा ब्रह्म से उत्पन्न हुई है, परंतु वह अपनी स्वयं की पहचान और अस्तित्व रखती है। जीवात्मा का ब्रह्म से विलग होना और माया द्वारा आवृत्त होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो उसे संसार में विभिन्न जन्म-मरण के चक्र से बाँधती है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बता रहे हैं कि आत्मा को माया के बंधनों से मुक्त किया जा सकता है, परंतु वह परमात्मा से एकाकार नहीं होती। आत्मा का अपना अस्तित्व है, और माया के प्रभाव से वह संसार में भ्रमित होती है। यह शाश्वत आत्मा माया के कारण संसार के भौतिक बंधनों में फँसी रहती है, परंतु जब यह माया से मुक्त होती है, तब भी इसका अस्तित्व कायम रहता है।


निष्कर्ष

श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए इस श्लोक में आत्मा की अविनाशी और अजर-अमर शक्ति को स्पष्ट किया गया है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आत्मा किसी भी बाहरी भौतिक या प्राकृतिक शक्ति से प्रभावित नहीं होती। चाहे वह हथियार हों, अग्नि हो, जल हो या वायु हो, आत्मा हमेशा अजेय और शाश्वत रहती है।

हमारा जीवन और पहचान केवल इस अस्थायी शरीर तक सीमित नहीं है। शरीर तो एक दिन नष्ट हो जाएगा, परंतु आत्मा अजर-अमर है और उसका अस्तित्व सदा के लिए बना रहता है। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण हमें यह संदेश देते हैं कि हमें अपने आत्मा के शाश्वत स्वरूप को पहचानकर जीवन के अस्थायी दुःखों से ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिए।

Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस

अध्याय 2 (Chapter 2)

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