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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 19 Shloka 19 | गीता अध्याय 2 श्लोक 19 अर्थ सहित | य एनं वेत्ति हन्तारं…..

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 12 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 19 in Hindi): भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों से अवगत कराया है। श्लोक 2.19(Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 19) में, श्रीकृष्ण आत्मा की अमरता और शाश्वतता का महत्व समझाते हैं। यह श्लोक न केवल युद्ध के संदर्भ में, बल्कि जीवन के हर पहलू में आत्मा के अनंत स्वरूप को उजागर करता है। इस श्लोक में दिए गए गहरे संदेश को समझना और आत्मसात करना आज भी हमारे जीवन के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत के समय था।

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 19 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 19)

गीता अध्याय 2 श्लोक 19 अर्थ सहित (Geeta Chapter 2 Verse 19 in Hindi with Meaning)

गीता अध्याय 2 श्लोक 19 अर्थ सहित (Geeta Chapter 2 Verse 19 in Hindi with meaning) | Festivalhindu.com
Geeta Chapter 2 Verse 19 in Hindi

श्लोक 2.19:

“य एनं वेत्ति हन्तारं यश्र्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥”

अर्थ:

यः – जो; एनम् – इसको; वेत्ति – जानता है; हन्तारम् – मारने वाला; यः – जो; च – भी; एनम् – इसे; मन्यते – मानता है; हतम् – मरा हुआ; उभौ – दोनों; तौ – वे; न – कभी नहीं; विजानीतः – जानते है; न – कभी नहीं; अयम् – यह; हन्ति – मारता है; न – नहीं; हन्यते – मारा जाता है |


जो व्यक्ति आत्मा को मारने वाला समझता है, और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों अज्ञान में हैं। आत्मा न मारता है, न मारा जाता है। आत्मा शाश्वत, अविनाशी और अजर-अमर है।

आत्मा और शरीर का अंतर

गीता के इस श्लोक का मूल संदेश यह है कि आत्मा और शरीर दो अलग-अलग तत्व हैं। शरीर नश्वर है, जो जन्म लेता है और समय आने पर नष्ट हो जाता है। लेकिन आत्मा अजर-अमर है। आत्मा किसी प्रकार के भौतिक तत्व से प्रभावित नहीं होती। इसे न तो कोई हथियार मार सकता है, न ही इसे जलाया, गीला, सुखाया या काटा जा सकता है। यह शाश्वत और अविनाशी है।

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को समझाते हैं कि जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह किसी की आत्मा को मार सकता है, वह अज्ञानी है। इसी प्रकार, जो यह मानता है कि आत्मा मारी जा सकती है, वह भी अज्ञान में है। आत्मा किसी भी परिस्थिति में मारी नहीं जा सकती, यह शरीर का विनाश ही होता है, आत्मा का नहीं।

आत्मा की अमरता

गीता के श्लोक 2.19 में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा के अमर और शाश्वत स्वरूप को समझाते हैं। आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही मरती है। यह नष्ट नहीं हो सकती, इसलिए इसे मारने का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। आत्मा किसी भी प्रकार के भौतिक तत्वों से अछूती रहती है।

यह शाश्वत सत्य हमें जीवन के प्रति एक गहरी समझ और धैर्य प्रदान करता है। जब हम इस तथ्य को समझते हैं कि आत्मा अमर है और केवल शरीर नष्ट होता है, तो मृत्यु का भय और मोह स्वतः समाप्त हो जाता है। इस अमरत्व के ज्ञान से जीवन में आत्मा की महत्ता और उसके अनंत स्वरूप को समझने का मार्ग प्रशस्त होता है।

हिंसा का विरोध और कर्म

हालांकि भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की अमरता के बारे में बताते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि किसी को हिंसा का अधिकार है। गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी जीव की हिंसा करना अधर्म है। वैदिक धर्म का सिद्धांत है “मा हिंस्यात सर्वा भूतानि” अर्थात किसी भी जीव की हिंसा मत करो।

यहां यह बात स्पष्ट होती है कि आत्मा की अमरता का मतलब यह नहीं है कि शरीर को नष्ट करना सही है। आत्मा अमर है, लेकिन किसी भी जीव के शरीर की हिंसा करना अधर्म है। राज्य व्यवस्था और भगवद्विधान के अनुसार जीवों की अनधिकार हत्या अपराध मानी जाती है और इसके लिए दंड का प्रावधान है।

मुख्य बिंदु:

  • आत्मा शाश्वत, अजर-अमर और अविनाशी है।
  • शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं।
  • किसी भी प्रकार की हिंसा करना अधर्म है।
  • आत्मा की मृत्यु नहीं होती, केवल शरीर का नाश होता है।
  • अर्जुन को धर्म के अनुसार कार्य करना है, पाप के अनुसार नहीं।

निष्कर्ष

भगवद गीता का श्लोक 2.19 हमें जीवन और मृत्यु के सत्य को समझने का अवसर प्रदान करता है। आत्मा शाश्वत है, इसका न तो जन्म होता है, न मृत्यु। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आत्मा की अमरता को समझकर हमें अपने जीवन को सत्य, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलाना चाहिए। किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह पशु के प्रति हो या मानव के प्रति, निंदनीय है और धर्म के विरुद्ध है।

आत्मा की यह अनंतता हमें यह सिखाती है कि जीवन एक अनवरत यात्रा है और मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। श्रीकृष्ण के इस शाश्वत ज्ञान को जीवन में उतारकर हम आत्मा के अमरत्व और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ सकते हैं।

Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस

अध्याय 2 (Chapter 2)

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