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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 18 Shloka 18 | गीता अध्याय 2 श्लोक 18 अर्थ सहित | अन्तवन्त इमे देहा…..

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 12 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 18 in Hindi): भगवद गीता, जो जीवन के गूढ़ रहस्यों और आध्यात्मिक ज्ञान का असीम भंडार है, हमें आत्मा, शरीर, और कर्तव्य के संबंध में महत्वपूर्ण शिक्षा देती है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझाने के लिए जो उपदेश दिया, वह न केवल युद्ध के मैदान में बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी गहरे अर्थ रखता है। इसी श्रृंखला में श्लोक 2.18(Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 18) हमें आत्मा और शरीर के गूढ़ सत्य से परिचित कराता है। यह श्लोक आत्मा की शाश्वतता और शरीर की नश्वरता के बीच के संबंध को स्पष्ट करता है और हमें यह सिखाता है कि हमें अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए, चाहे हमारे सामने कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न हों।

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 18 (Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 18)

गीता अध्याय 2 श्लोक 18 अर्थ सहित (Geeta Chapter 2 Verse 18 in Hindi with meaning)

गीता अध्याय 2 श्लोक 18 अर्थ सहित (Geeta Chapter 2 Verse 18 in Hindi with meaning) | Festivalhindu.com
Geeta Chapter 2 Verse 18 in Hindi

श्लोक 2.18 का सार

श्लोक:
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः |
अनाशिनोSप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||

अन्त-वन्त – नाशवान;इमे – ये सब; देहाः – भौतिक शरीर; नित्यस्य – नित्य स्वरूप; उक्ताः – कहे जाते हैं; शरिरिणः – देहधारी जीव का; अनाशिनः – कभी नाश न होने वाला; अप्रमेयस्य – न मापा जा सकने योग्य; तस्मात् – अतः; युध्यस्व – युद्ध करो; भारत – हे भरतवंशी |

अविनाशी, अप्रमेय तथा शाश्र्वत जीव के भौतिक शरीर का अन्त अवश्यम्भावी है | अतः हे भारतवंशी! युद्ध करो |

भावार्थ:
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह भौतिक शरीर नश्वर है, जिसका अंत निश्चित है। परंतु आत्मा, जो इस शरीर में निवास करती है, न तो कभी नष्ट होती है और न ही इसे मापा जा सकता है। इसलिए, हे भारतवंशी अर्जुन, तुम शोक मत करो और अपने धर्म के अनुसार कर्तव्यों का पालन करते हुए युद्ध करो।

यह श्लोक यह संदेश देता है कि शरीर का अंत निश्चित है, परंतु आत्मा अमर और अपरिमेय है। इस दृष्टिकोण से, हमें भौतिक शरीर के नाश से दुखी नहीं होना चाहिए और जीवन के कर्तव्यों को निभाने में तत्पर रहना चाहिए।


भौतिक शरीर की नश्वरता

  1. शरीर का नाशवान स्वभाव:
    भगवद गीता का यह श्लोक हमें यह बताता है कि शरीर स्वभाव से ही नश्वर होता है। चाहे यह आज नष्ट हो जाए या सौ वर्षों बाद, इसका अंत निश्चित है। शरीर एक भौतिक आवरण मात्र है, जो समय के साथ नष्ट हो जाता है।
  2. शरीर का समय के अधीन होना:
    शरीर को अनंतकाल तक बनाए रखने की कोई संभावना नहीं होती। यह केवल समय की बात होती है कि शरीर कब समाप्त होगा। गीता हमें यह सिखाती है कि हमें शरीर के नाश से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि यह प्रकृति का नियम है।
  3. अर्जुन के संदर्भ में शारीरिक नश्वरता:
    भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि वह जिनके लिए शोक कर रहा है, वे केवल अपने भौतिक शरीर के कारण नहीं मारे जा रहे हैं, क्योंकि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। युद्ध के मैदान में अपने प्रियजनों के शरीर का नाश निश्चित है, परंतु आत्मा अमर है।

आत्मा का शाश्वत और अमर स्वरूप

  1. आत्मा का सूक्ष्म और अपरिमेय स्वरूप:
    आत्मा इतनी सूक्ष्म है कि इसे न देखा जा सकता है और न मापा जा सकता है। गीता में कहा गया है कि आत्मा का कोई आकार या रूप नहीं होता, और यह किसी भी भौतिक साधन से नष्ट नहीं हो सकती। शरीर के नाश होने पर भी आत्मा बनी रहती है, और यह नए शरीर में प्रवेश करती है।
  2. आत्मा का शाश्वत प्रकाश:
    वेदांत-सूत्र में आत्मा को प्रकाश के रूप में वर्णित किया गया है। यह परमात्मा का अंश है, और जैसे सूर्य अपने प्रकाश से पूरे ब्रह्मांड का पोषण करता है, वैसे ही आत्मा अपने सूक्ष्म प्रकाश से शरीर का पोषण करती है। जैसे ही आत्मा शरीर से बाहर निकलती है, शरीर सड़ने लगता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आत्मा ही जीवन का वास्तविक स्रोत है।
  3. अमरत्व का बोध:
    गीता के अनुसार आत्मा अजर-अमर है। यह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त है और शरीर के साथ इसका कोई सीधा संबंध नहीं होता। आत्मा का यह शाश्वत स्वरूप हमें यह समझने में मदद करता है कि शरीर के नाश से हमें भयभीत नहीं होना चाहिए।

कर्तव्य और धर्मयुद्ध का महत्व

  1. धर्म का पालन आवश्यक है:
    भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह उपदेश देते हैं कि उन्हें अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए, भले ही शरीर नश्वर हो। धर्म का पालन करना सबसे महत्वपूर्ण है, और अपने धर्म के अनुसार कर्तव्य निभाना ही वास्तविक जीवन का उद्देश्य है।
  2. शरीर की महत्त्वहीनता:
    शरीर अपने आप में महत्त्वहीन है, क्योंकि यह केवल आत्मा का एक आवरण है। आत्मा ही जीवन का वास्तविक स्रोत है, और जब आत्मा शरीर से बाहर निकलती है, तो शरीर का कोई मूल्य नहीं रहता। इसलिए, श्रीकृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं कि उसे शरीर की चिंता किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
  3. शोक का कोई कारण नहीं:
    अर्जुन को यह समझाया गया कि आत्मा के शाश्वत स्वरूप को समझने से शोक का कोई कारण नहीं होता। शरीर नाशवान है, लेकिन आत्मा नाश नहीं हो सकती। इसलिए युद्ध के मैदान में अपने प्रियजनों के लिए शोक करना व्यर्थ है, क्योंकि आत्मा को किसी भी परिस्थिति में नष्ट नहीं किया जा सकता।

श्लोक 2.18 का जीवन में महत्व

  1. आध्यात्मिक दृष्टिकोण:
    यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। आत्मा अमर है और शरीर का नाश तो केवल समय की बात है। इस सत्य को समझने से हमें जीवन में शांति और संतोष प्राप्त होता है।
  2. कर्तव्यों का पालन:
    श्लोक 2.18 हमें यह शिक्षा देता है कि हमें अपने कर्तव्यों से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे हमारे सामने कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, हमें धर्म और सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
  3. आत्मा और शरीर के बीच का अंतर:
    गीता का यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आत्मा और शरीर दो अलग-अलग तत्व हैं। शरीर नाशवान है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। इस सत्य को समझने से जीवन में शोक और भय का अंत होता है।

निष्कर्ष


श्लोक 2.18 जीवन का एक गहरा और महत्वपूर्ण सत्य प्रकट करता है कि शरीर नाशवान है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश दिया कि आत्मा के शाश्वत स्वरूप को समझने से शोक का कोई कारण नहीं है और शरीर की नश्वरता से घबराने की आवश्यकता नहीं है।

Resources : श्रीमद्भागवत गीता यथारूप – बक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, गीता प्रेस

अध्याय 2 (Chapter 2)

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