Mahabharat:महाभारत के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती की मृत्यु कैसे हुई?

LAST UPDATED: 14 April 2026

महाभारत का युद्ध अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना थी, जिसने पूरे आर्यावर्त को झकझोर दिया। इस युद्ध में कौरवों का संपूर्ण वंश समाप्त हो गया, और पांडव विजयी हुए। हस्तिनापुर का राज्य पांडवों को प्राप्त हुआ। कौरवों में केवल युयुत्सु जीवित रहे क्योंकि उन्होंने युद्ध में पांडवों का साथ दिया था। परंतु, वंश नाश के बाद धृतराष्ट्र और गांधारी को अपने शेष जीवन का सामना करना पड़ा। इस लेख में हम जानेंगे कि महाभारत के युद्ध के बाद इन प्रमुख पात्रों का जीवन कैसा बीता और उनका अंतिम समय कैसे हुआ।

महाभारत के युद्ध के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती का क्या हुआ?

महाभारत के युद्ध के बाद हस्तिनापुर में पांडवों का शासन स्थापित हुआ। युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया, और उन्होंने राज्य के प्रबंधन में अपनी नीतियों से शांति और धर्म का अनुसरण किया। लेकिन युद्ध के परिणामस्वरूप हुए भारी विनाश ने सभी के जीवन को प्रभावित किया

गांधारी और धृतराष्ट्र ने अपने सौ पुत्रों को खो दिया था, और उनका जीवन दुःख और पश्चाताप से भर गया था। गांधारी ने अपने पुत्रों की मृत्यु के लिए श्रीकृष्ण को जिम्मेदार ठहराया और उन्हें श्राप दिया कि उनका वंश भी नष्ट हो जाएगा। उधर, धृतराष्ट्र भी युद्ध के दौरान भीम द्वारा दुर्योधन को पराजित करने और उनके रक्त से द्रौपदी के बाल धुलवाने की घटना से अत्यंत आहत थे।


युद्ध के बाद भी धृतराष्ट्र भीम के प्रति अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सके। उन्होंने एक बार भीम को मारने का भी प्रयास किया, लेकिन समय पर विदुर ने उन्हें रोक लिया। हालांकि, पांडवों की माता कुंती ने धृतराष्ट्र और गांधारी का पूरा ध्यान रखा और उनके प्रति हमेशा आदर और सेवा का भाव रखा।


भीम के व्यंग्य से आहत होकर, धृतराष्ट्र और गांधारी ने महल छोड़ने और वन में जाकर तपस्या करने का निर्णय लिया। उनके इस निर्णय में संजय और कुंती ने भी उनका साथ दिया। चारो ने हरिद्वार के पास एक वन में जाकर तपस्वियों की भांति जीवन व्यतीत करना शुरू किया। उन्होंने सांसारिक सुखों को त्याग दिया और अपने शेष जीवन को धर्म और तपस्या में समर्पित कर दिया।

धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती की मृत्यु कैसी हुई?

जब धृतराष्ट्र, गांधारी, और कुंती वन में अपना समय व्यतीत कर रहे थे, तो एक दिन देवर्षि नारद युधिष्ठिर के पास पहुंचे। युधिष्ठिर ने उनसे अपने परिजनों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। नारद मुनि ने युधिष्ठिर को बताया कि धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती तपस्या में लीन हैं।

लेकिन तभी वन में एक भयंकर आग लग गई। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती अपने वृद्ध और दुर्बल शरीर के कारण आग से बचने के लिए भागने में असमर्थ थे। उन्होंने उसी आग में प्राण त्यागने का निर्णय लिया और एकाग्रचित्त होकर अग्नि को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
कुंती ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया। अपने पुत्रों को हर परिस्थिति में एकजुट रखने वाली कुंती ने धृतराष्ट्र और गांधारी का ध्यान रखा और उनकी सेवा की। उनके अंतिम समय में भी वह उनके साथ ही रहीं और उनके साथ ही प्राण त्याग दिए। यह उनकी त्यागमयी और करुणा से भरी हुई प्रवृत्ति को दर्शाता है।

महाभारत के युद्ध के बाद संजय का क्या हुआ?

जब आग ने पूरे वन को घेर लिया, तब संजय ने वहां से प्रस्थान किया। उन्होंने हिमालय की ओर रुख किया और शेष जीवन एक सन्यासी की भांति व्यतीत किया। उन्होंने सांसारिक मोह को त्यागकर आत्मसाधना का मार्ग अपनाया।

महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो का क्या हुआ?

नारद मुनि से यह सब सुनकर पांडव अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने अपने पूर्वजों और माता कुंती की मृत्यु का शोक मनाया। युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक उनका श्राद्ध कर्म किया और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी। उन्होंने उनके आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
कई वर्षों तक हस्तिनापुर पर शासन करने के बाद, पांडवों ने भी अपने सांसारिक कार्यों को समाप्त कर स्वर्गारोहण का निर्णय लिया। उन्होंने महाप्रस्थान किया और स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया। दूसरी ओर, भगवान कृष्ण ने भी अपना लीला अवतार समाप्त किया और बैकुंठ धाम को चले गए।


महाभारत के युद्ध के परिणामस्वरूप जो घटनाएं हुईं, वे कलियुग के आरंभ का संकेत थीं। भगवान कृष्ण के बैकुंठ धाम जाने के बाद धरती पर कलियुग का आगमन हुआ। इस युग में धर्म, सत्य, और आदर्शों का क्षरण होना शुरू हुआ।

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