Bhagwan Shri Krishna Ko kyu Kehte hai Ranchhod: भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नाम हैं और प्रत्येक नाम के पीछे कोई न कोई गूढ़ अर्थ और दिव्य लीला छिपी हुई है। उन्हीं नामों में से एक नाम है “रणछोर”। सामान्य रूप से देखा जाए तो युद्धभूमि छोड़ देना किसी भी योद्धा के लिए कायरता माना जाता है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के संदर्भ में यही घटना उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता और दूरदर्शी रणनीति का उदाहरण बन जाती है। श्रीकृष्ण को रणछोर कहे जाने के पीछे कालयवन से जुड़ी जो कथा है, वह केवल एक युद्ध प्रसंग नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि कब बल से नहीं, बल्कि बुद्धि से विजय पाई जाती है।
द्वापर युग की पृष्ठभूमि और जरासंध के आक्रमण
यह कथा द्वापर युग की है, जब मगध नरेश जरासंध बार-बार मथुरा पर आक्रमण कर रहा था। कहा जाता है कि उसने सत्रह बार मथुरा पर चढ़ाई की और हर बार भगवान श्रीकृष्ण ने उसे पराजित किया। मथुरा की रक्षा करते हुए श्रीकृष्ण ने न केवल अपनी वीरता दिखाई, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि धर्म की रक्षा के लिए वे हर बार खड़े रहेंगे। लेकिन अठारहवीं बार जरासंध ने अपनी रणनीति बदली और एक नए, अत्यंत शक्तिशाली सहयोगी को अपने साथ मिला लिया। यह सहयोगी था यवन राजा कालयवन, जिसकी शक्ति और वरदान के कारण स्थिति पहले से कहीं अधिक जटिल हो गई।
कालयवन और शिव का वरदान
कालयवन कोई साधारण योद्धा नहीं था। उसे भगवान शिव से यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी योद्धा या अस्त्र-शस्त्र उसे मार नहीं सकेगा। इस वरदान ने उसे लगभग अजेय बना दिया था। अपने इसी आत्मविश्वास के बल पर वह विशाल सेना के साथ मथुरा की सीमा पर आ खड़ा हुआ और श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारने लगा। श्रीकृष्ण भली-भांति जानते थे कि यदि इस स्थिति में सीधा युद्ध हुआ, तो मथुरा की निर्दोष जनता को भारी क्षति उठानी पड़ेगी। साथ ही, शिव के वरदान के कारण कालयवन को शस्त्रों से मारना भी संभव नहीं था। ऐसे में युद्ध का मार्ग चुनना न तो व्यावहारिक था और न ही धर्म के अनुकूल।
रणभूमि से प्रस्थान और रणनीतिक निर्णय
जब कालयवन युद्ध के लिए चुनौती देने लगा, तब श्रीकृष्ण बिना किसी शस्त्र के रणभूमि से दूर जाने लगे। बाहरी दृष्टि से देखने पर यह प्रतीत होता है कि वे युद्ध से भाग रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह उनका सोचा-समझा हुआ निर्णय था। कालयवन ने इसे कायरता समझा और पूरी तेजी से श्रीकृष्ण का पीछा करने लगा। श्रीकृष्ण उसे बहुत दूर तक ले गए, जहां एक अंधेरी गुफा स्थित थी। यह वही स्थान था जहां त्रेतायुग के राजा मुचकुंद गहरी नींद में सो रहे थे। श्रीकृष्ण जानते थे कि इस स्थान तक कालयवन को लाना ही समस्या का समाधान है।
राजा मुचकुंद का वरदान और गुफा का रहस्य
राजा मुचकुंद ने पहले देवताओं की सहायता करते हुए असुरों के विरुद्ध लंबे समय तक युद्ध किया था। इस सेवा से प्रसन्न होकर देव राज इंद्र ने उन्हें एक विशेष वरदान दिया था कि वे दीर्घकाल तक निश्चिंत होकर सो सकेंगे और जो भी उनकी नींद में बाधा डालेगा, वह उनकी पहली दृष्टि पड़ते ही भस्म हो जाएगा। अत्यधिक युद्ध और परिश्रम के बाद मुचकुंद इसी गुफा में विश्राम कर रहे थे। श्रीकृष्ण को इस वरदान की पूरी जानकारी थी और उन्होंने इसी दिव्य व्यवस्था का सहारा लेकर कालयवन के अंत की योजना बनाई।
चतुराई से रचा गया अंत
श्रीकृष्ण ने अत्यंत चतुराई से अपना पीतांबर सोए हुए राजा मुचकुंद पर डाल दिया और स्वयं अंधेरे में छिप गए। कालयवन जब गुफा में पहुंचा तो उसने सोए हुए मुचकुंद को ही श्रीकृष्ण समझ लिया। क्रोध में आकर उसने जोर से उन्हें लात मारी ताकि वे उठकर युद्ध करें। जैसे ही मुचकुंद की नींद टूटी और उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी, उसी क्षण वह जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग और बिना रक्त बहाए श्रीकृष्ण ने अपने शत्रु का अंत कर दिया। यह घटना स्पष्ट करती है कि उनकी विजय केवल शक्ति पर नहीं, बल्कि सूझबूझ और समयानुकूल निर्णय पर आधारित थी।
रणछोर नाम की उत्पत्ति और उसका अर्थ
चूंकि श्रीकृष्ण ने युद्ध का मैदान छोड़ दिया था, इसलिए जरासंध और कालयवन की सेना ने उनका उपहास उड़ाते हुए उन्हें “रणछोर” कहना शुरू कर दिया। उनके अनुसार, जो युद्ध से भाग जाए, वह रणछोर कहलाने योग्य है। लेकिन यह नाम आगे चलकर अपमान का नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की बुद्धिमत्ता का प्रतीक बन गया। उनके भक्तों ने भी इस नाम को बड़े प्रेम और सम्मान के साथ अपनाया, क्योंकि वे जानते थे कि यह पलायन नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ रणनीति थी, जिससे न केवल शत्रु का अंत हुआ बल्कि मथुरा की जनता भी सुरक्षित रही।
बुद्धि से प्राप्त विजय का संदेश
इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि हर परिस्थिति में सीधा संघर्ष ही समाधान नहीं होता। कभी-कभी पीछे हटना भी आगे की बड़ी विजय का मार्ग प्रशस्त करता है। श्रीकृष्ण ने यह सिद्ध किया कि सच्चा पराक्रम केवल शस्त्र उठाने में नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने में है। कालयवन के वरदान और मथुरा की सुरक्षा, दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जो मार्ग चुना, वह धर्म, नीति और करुणा तीनों के अनुरूप था।
इस घटना के बाद “रणछोर” नाम केवल एक ऐतिहासिक उपाधि नहीं रहा, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का एक विशेष पहलू बन गया। यह नाम यह स्मरण कराता है कि भगवान केवल युद्ध जीतने वाले योद्धा नहीं, बल्कि जीवन की जटिल परिस्थितियों में मार्ग दिखाने वाले महान रणनीतिकार भी हैं। भक्तों के लिए यह नाम प्रेरणा का स्रोत है कि कठिन समय में धैर्य, विवेक और बुद्धि से काम लेना ही सबसे बड़ा धर्म है।
कालयवन की कथा और श्रीकृष्ण के रणभूमि से प्रस्थान की घटना यह सिखाती है कि भगवान के प्रत्येक कार्य के पीछे गहरी योजना और लोककल्याण की भावना होती है। उन्हें रणछोर कहे जाने का कारण केवल इतना था कि उन्होंने प्रत्यक्ष युद्ध का मार्ग नहीं चुना, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसी निर्णय से शत्रु का अंत हुआ और निर्दोष लोगों की रक्षा भी हुई। इस प्रकार “रणछोर” नाम भगवान श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता, करुणा और अद्भुत बुद्धिमत्ता का प्रतीक बन गया, जिसे उनके भक्त आज भी श्रद्धा और प्रेम से स्मरण करते हैं।
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