Sankashti Chaturthi|संकष्टी चतुर्थी फरवरी 2026 में कब| जानें तिथि, पूजा विधि और महत्व

Feb 2026 Sankashti Chaturthi: सनातन धर्म में संकष्टी चतुर्थी का अत्यंत विशेष महत्व माना गया है। यह व्रत प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है और भगवान गणेश को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत जीवन में आने वाले संकटों, विघ्नों और मानसिक परेशानियों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है, इसलिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन माना जाता है।

संकष्टी चतुर्थी
Image Source: AI Generated, Feb 2026 Sankashti Chaturthi Date

फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान गणेश की पूजा की जाती है और भक्त संतान की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन में स्थिरता की कामना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस तिथि पर श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया व्रत जीवन के कठिन समय में सहारा बनता है और नकारात्मक परिस्थितियों को दूर करने में सहायक होता है। यही कारण है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी को अन्य संकष्टी चतुर्थियों की तुलना में अधिक फलदायी माना गया है।

कब है द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026?

वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 5 फरवरी 2026 को रात 12 बजकर 09 मिनट से होगी और इसका समापन 6 फरवरी 2026 को रात 12 बजकर 22 मिनट पर होगा। चूंकि सनातन धर्म में व्रत और पर्वों का निर्धारण उदयातिथि के आधार पर किया जाता है, इसलिए द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 फरवरी 2026, गुरुवार के दिन रखा जाएगा।

इस दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखकर भगवान गणेश की आराधना करते हैं और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं। यह तिथि उन लोगों के लिए विशेष मानी जाती है जो जीवन में लगातार आने वाली बाधाओं से परेशान रहते हैं और गणपति बप्पा की कृपा से स्थिरता और शांति प्राप्त करना चाहते हैं।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 क्यों है खास महत्व?

वर्ष 2026 में द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि इस दिन सुकर्मा योग का निर्माण हो रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सुकर्मा योग में किए गए शुभ कार्य विशेष फल प्रदान करते हैं। इस योग में भगवान गणेश की पूजा करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि जब संकष्टी चतुर्थी जैसे महत्वपूर्ण व्रत पर शुभ योग का संयोग बनता है, तो उस दिन की गई साधना का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इस कारण द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 को विशेष रूप से फलदायी माना जा रहा है। भक्त इस दिन पूरी श्रद्धा और नियम के साथ गणेश पूजा करके जीवन में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति की कामना करते हैं।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व क्या है?

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख, संतान की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन में आने वाली बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं और कार्यों में सफलता मिलने लगती है।

इसके साथ ही यह व्रत मानसिक शांति प्रदान करने वाला भी माना गया है। जो भक्त नियमित रूप से संकष्टी चतुर्थी का व्रत करते हैं, उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। भगवान गणेश की आराधना से भय, तनाव और अनिश्चितता की भावना कम होती है और व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना कर पाता है। इस प्रकार द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि क्या है?

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा विधि को श्रद्धा और शुद्धता के साथ करना आवश्यक माना गया है। इस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद घर के पूजा स्थान में भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करके दीपक जलाया जाता है। पूजा के दौरान भगवान गणेश को दूर्वा, पुष्प, मोदक और लड्डू अर्पित किए जाते हैं, क्योंकि ये उन्हें अत्यंत प्रिय माने जाते हैं।

पूजा के समय “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जाता है। पूरे दिन व्रत रखकर भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है और मन को संयमित रखा जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है। चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्घ्य देकर भगवान गणेश से सुख-समृद्धि और विघ्नों से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है।

चंद्र दर्शन का महत्व क्या है?

संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा मन का प्रतीक माने जाते हैं और उनके दर्शन से मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। चंद्रमा को जल अर्पित करते समय भगवान गणेश से जीवन की कठिनाइयों को दूर करने और सुख-समृद्धि प्रदान करने की कामना की जाती है।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 में 5 फरवरी को मनाई जाएगी और इस दिन सुकर्मा योग के कारण व्रत का फल और भी अधिक शुभ माना जा रहा है। ऐसा विश्वास है कि जो भक्त इस दिन श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ भगवान गणेश की पूजा करता है, उसके जीवन में आने वाली परेशानियां धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। यदि आप भी जीवन में स्थिरता, घर में सुख-शांति और मानसिक संतुलन चाहते हैं, तो द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूरे विधि-विधान से भगवान गणेश की आराधना अवश्य करें।

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