रोहिणी व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत प्रत्येक माह रोहिणी नक्षत्र के दिन रखा जाता है और भगवान ऋषभदेव, जो पहले तीर्थंकर थे, और उनकी पत्नी मृगावती देवी की पूजा के लिए समर्पित होता है। इस लेख में, हम मई 2024 में रोहिणी व्रत की तिथि, महत्व, पूजा विधि और इससे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में विस्तार से जानेंगे।

मई 2024 में रोहिणी व्रत की तिथि और समय (Rohini Vrat 2024 Date)
मई 2024 में रोहिणी व्रत शुक्रवार, 10 मई 2024 को रखा जाएगा।
- नक्षत्र: रोहिणी
- दिनांक: शुक्ल पक्ष, वैशाख मास
- सूर्योदय: 5:21 बजे
- सूर्यास्त: 6:40 बजे
रोहिणी व्रत का महत्व (Rohini Vrat Importance)
रोहिणी व्रत को जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इसके कई महत्व हैं, जिनके बारे में नीचे विस्तार से बताया गया है:
- पापों का नाश: रोहिणी व्रत को सभी प्रकार के पापों और नकारात्मक कर्मों को दूर करने में सहायक माना जाता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति के आत्मिक शुद्धिकरण का मार्ग प्रशस्त होता है।
- सुख-समृद्धि की प्राप्ति: भगवान ऋषभदेव और मृगावती देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए रोहिणी व्रत रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि विधि-विधान से इस व्रत को करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं।
- मोक्ष की प्राप्ति: जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए आध्यात्मिक उन्नति आवश्यक है। रोहिणी व्रत आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है और मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है।
- मनोकामना पूर्ति: जैन धर्म में ऐसा माना जाता है कि जो श्रद्धा भाव से और विधि-विधान से रोहिणी व्रत रखता है, भगवान ऋषभदेव उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण करते हैं।
रोहिणी व्रत की पूजा विधि (Rohini Vrat Puja Vidhi)
रोहिणी व्रत को विधि-विधान से करने से ही इसका पूरा फल प्राप्त होता है। रोहिणी व्रत की पूजा विधि निम्नलिखित है:
- व्रत की पूर्व संध्या: रोहिणी व्रत की पूर्व संध्या को सूर्यास्त से पहले स्नान कर लेना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद घर की साफ-सफाई करनी चाहिए और पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करके सजाना चाहिए।
- व्रत का दिन: व्रत के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान पर भगवान ऋषभदेव और मृगावती देवी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजा: इसके बाद भगवान ऋषभदेव और मृगावती देवी की षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए। इसमें आसन, जल, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, वंदन, क्षमाप्रार्थना, आरती और परिणाम शामिल हैं।
- व्रत कथा का पाठ: भगवान ऋषभदेव और मृगावती देवी की पूजा करने के बाद श्रद्धा भाव से रोहिणी व्रत की कथा का पाठ करना चाहिए।
- व्रत का पालन: पूजा के बाद दिनभर उपवास रखना चाहिए। आप चाहें तो निर्जला व्रत रख सकते हैं या फिर फलाहार ग्रहण कर सकते हैं। फलाहार में दूध, फल, और मेवे आदि का सेवन किया जा सकता है।
- व्रत का पारण: शाम को सूर्यास्त के बाद व्रत का पारण करना चाहिए। पारण करने से पहले भगवान ऋषभदेव और मृगावती देवी की संक्षिप्त पूजा करें और उन्हें भोग लगाएं। इसके बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करें।
- दान का महत्व: जैन धर्म में दान का विशेष महत्व है। रोहिणी व्रत के बाद दान-पुण्य करने से व्रत का फल और भी अधिक बढ़ जाता है। गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या दक्षिणा आदि का दान किया जा सकता है।
रोहिणी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा (Rohini Vrat Katha)
रोहिणी व्रत के महत्व को समझने के लिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा का ज्ञान होना आवश्यक है।
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान ऋषभदेव के 24 तीर्थंकर पुत्र थे। इनमें से एक पुत्र का नाम भरत चक्रवर्ती था। भरत चक्रवर्ती अत्यंत सुंदर और बलशाली थे। उन्हें अपनी सुंदरता और शक्ति पर अहंकार हो गया था। एक दिन, वे जंगल में घूम रहे थे कि उनकी मुलाकात एक ऋषि से हुई। ऋषि ने भरत चक्रवर्ती को उनकी शक्ति और सुंदरता का दुरुपयोग न करने की सलाह दी। भरत चक्रवर्ती ने ऋषि की बातों को अनदेखा कर दिया और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लगे। ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने भरत चक्रवर्ती को श्राप दिया कि वे कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो जाएंगे।
भरत चक्रवर्ती कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए और उन्होंने अपना सब कुछ खो दिया। वे दर-दर भटकने लगे। एक दिन, वे भगवान ऋषभदेव के पास पहुंचे और उनसे क्षमा मांगी। भगवान ऋषभदेव ने उन्हें क्षमा कर दिया और उन्हें रोहिणी व्रत रखने की सलाह दी। भरत चक्रवर्ती ने विधि-विधान से रोहिणी व्रत रखा और उनकी कुष्ठ रोग ठीक हो गया।
तब से जैन धर्म में यह परंपरा चली आ रही है कि मोक्ष की प्राप्ति और पापों के नाश के लिए रोहिणी व्रत रखा जाता है।
रोहिणी व्रत से जुड़ी मान्यताएं (Rohini Vrat Significance)
रोहिणी व्रत से जुड़ी कुछ अन्य मान्यताएं भी हैं, जिनके बारे में नीचे बताया गया है:
- विवाह में बाधा दूर करना: विवाह में देरी हो रही हो या विवाह में कोई बाधा आ रही हो, तो ऐसी स्थिति में रोहिणी व्रत रखने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि विधि-विधान से रोहिणी व्रत रखने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और शीघ्र विवाह का योग बनता है।
- संतान प्राप्ति: संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्ति भी रोहिणी व्रत रख सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान ऋषभदेव और मृगावती देवी की कृपा से संतान प्राप्ति का सुख प्राप्त होता है।
- व्यवसाय में सफलता: व्यवसाय में सफलता पाने के लिए भी रोहिणी व्रत रखा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से व्यापार में वृद्धि होती है और सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।
उपसंहार
रोहिणी व्रत जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत आध्यात्मिक उन्नति, पापों के नाश, सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति में धैर्य, संयम और त्याग के गुणों का विकास होता है। रोहिणी व्रत कथा हमें यह सीख देती है कि अहंकार का त्याग करना कितना आवश्यक है। साथ ही, यह कथा हमें यह भी संदेश देती है कि भगवान की कृपा से कोई भी कष्ट दूर हो सकता है।
हालाँकि, यह आवश्यक नहीं है कि रोहिणी व्रत का पालन केवल जैन धर्मावलंबी ही करें। अन्य धर्मों के लोग भी श्रद्धाभाव से इस व्रत को रख सकते हैं। किसी भी व्रत का असली महत्व आडंबरों में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे संदेशों को समझने और उनका पालन करने में होता है। रोहिणी व्रत हमें यही सीख देता है कि सच्चा सुख और शांति आंतरिक शांति से ही प्राप्त होती है।