Papmochani Ekadashi 2026 Date: भक्त पापमोचिनी एकादशी का व्रत अपने जीवन में किए गए पापों, मानसिक कष्टों और दुखों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से रखते हैं। यह एकादशी न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है, बल्कि इसे आत्मशुद्धि और मानसिक (march 2026 me ekadashi kab hai) शांति प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन भी माना गया है। ऐसा विश्वास है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसका जीवन सुख, संतोष और स्थिरता की ओर अग्रसर होता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने से केवल वर्तमान जीवन के ही नहीं, बल्कि पूर्व जन्मों से जुड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि इस एकादशी को पापों का नाश करने वाली और जीवन को पुनः धर्म के मार्ग पर लाने वाली तिथि माना गया है। भक्त इस दिन परम भक्ति और अटूट विश्वास के साथ भगवान श्रीहरि की आराधना करते हैं, ताकि वे अपने जीवन में आत्मनिर्भर, संयमी और आनंदमय बन सकें।
यह एकादशी प्रतिवर्ष आती है और भक्तों को बार-बार अपने जीवन की गलतियों से सीख लेकर स्वयं को सुधारने का अवसर देती है। जो लोग इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करते हैं, उनके लिए यह दिन केवल उपवास का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मिक उन्नति का पर्व बन जाता है।
पापमोचनी एकादशी 2026 व्रत तिथि और पारण समय
हिंदू पंचांग के अनुसार पापमोचिनी एकादशी होली और चैत्र नवरात्रि के बीच आती है और यह चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह पर्व मार्च या अप्रैल के महीने में पड़ता है। इस दिन भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की विशेष पूजा करते हैं।
वर्ष 2026 में पापमोचिनी एकादशी रविवार, 15 मार्च को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि का आरंभ 14 मार्च 2026 को प्रातः 08 बजकर 10 मिनट से होगा और यह तिथि 15 मार्च 2026 को प्रातः 09 बजकर 16 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि एकादशी तिथि का अधिकांश भाग 15 मार्च को पड़ रहा है, इसलिए व्रत इसी दिन रखा जाएगा।
व्रत का पारण एकादशी के अगले दिन किया जाता है और इसे अत्यंत आवश्यक माना जाता है। वर्ष 2026 में व्रत पारण का समय 16 मार्च को प्रातः 06 बजकर 30 मिनट से प्रातः 08 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस समय के भीतर भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद व्रत तोड़ना शुभ और पूर्ण फलदायी माना गया है। कहा जाता है कि यदि सही समय पर पारण न किया जाए तो व्रत का पूरा फल प्राप्त नहीं होता, इसलिए पारण का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पापमोचिनी एकादशी 2026 व्रत की पूजा विधि
पापमोचिनी एकादशी का पर्व अत्यंत पवित्र माना जाता है, इसलिए भक्त इस दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करते हैं। बहुत से श्रद्धालु नदी, तालाब या किसी पवित्र जलस्रोत में स्नान करना शुभ मानते हैं, हालांकि घर पर स्वच्छ जल से स्नान कर लेना भी पर्याप्त माना जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल की साफ-सफाई की जाती है और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को स्थापित किया जाता है।
पूजा के दौरान भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते, चंदन, फूल और अगरबत्ती अर्पित की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है, इसलिए तुलसी पत्र का विशेष महत्व होता है। इसके साथ ही भगवान को विशेष भोग अर्पित किया जाता है, जिससे पूजा की पूर्णता मानी जाती है और भक्त को संतोष की अनुभूति होती है।
इस दिन व्रत रखने वाले भक्त उसी दिन अन्न ग्रहण नहीं करते। जो लोग कठोर व्रत नहीं रख पाते, वे फल और दूध का सेवन कर सकते हैं, लेकिन तामसिक भोजन और अनावश्यक भोग-विलास से दूर रहना आवश्यक माना जाता है। पूरे दिन भगवान विष्णु के नाम का स्मरण, मंत्र जाप और भजन-कीर्तन करने से मन को शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
एकादशी की रात को पापमोचिनी एकादशी की कथा का पाठ किया जाता है और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्यनारायण कथा का पाठ या श्रवण करने से भी भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। संध्याकाल में भगवान की आरती की जाती है और वातावरण भक्तिमय हो जाता है। अगले दिन प्रातःकाल पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है और फिर सामान्य भोजन ग्रहण किया जाता है।
पापमोचिनी एकादशी के पीछे की कहानी
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पापमोचिनी एकादशी की कथा सुनाई थी। इसी कथा का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि एक समय राजा मंधाता ने महान ऋषि लोमश से यह प्रश्न किया कि मनुष्य अपने जीवन में किए गए सभी पापों से कैसे मुक्त हो सकता है। तब ऋषि लोमश ने उन्हें पापमोचिनी एकादशी की यह पावन कथा सुनाई।
कथा की शुरुआत ऋषि च्यवन के पुत्र मेघवी से होती है, जो वर्षों से कठोर तपस्या में लीन थे। वे भगवान शिव की आराधना में पूर्ण रूप से समर्पित थे और उनका मन सांसारिक विषयों से पूर्णतः दूर था। उनकी तपस्या की शक्ति इतनी अधिक थी कि देवताओं के राजा इंद्र को यह भय होने लगा कि कहीं उनकी साधना से उनका पद संकट में न पड़ जाए।
इसी ईर्ष्या के कारण इंद्र ने मेघवी की तपस्या भंग करने की योजना बनाई और एक सुंदर अप्सरा को इस कार्य के लिए भेजा, जिसका नाम मंजुघोषा था। मंजुघोषा ने अनेक प्रकार से मेघवी को आकर्षित करने का प्रयास किया, लेकिन प्रारंभ में वे अपने संकल्प पर अडिग रहे। जब इंद्र को लगा कि केवल अप्सरा से कार्य सिद्ध नहीं होगा, तब उन्होंने कामदेव को भी सहायता के लिए भेजा।
अंततः मंजुघोषा अपने प्रयासों में सफल हो गई और मेघवी का ध्यान भंग हो गया। धीरे-धीरे वे उसके साथ रहने लगे और अपनी साधना से दूर हो गए। इस प्रकार वे अपने धार्मिक मार्ग से भटक गए और सांसारिक जीवन में लिप्त हो गए।
लंबे समय तक इस स्थिति में रहने के बाद मेघवी को अपने पाप का बोध हुआ। उन्हें यह एहसास हुआ कि उन्होंने अपनी तपस्या और संयम को त्याग कर गंभीर अपराध किया है। इस आत्मबोध के साथ उनके मन में गहरा पश्चाताप उत्पन्न हुआ और क्रोध में आकर उन्होंने मंजुघोषा को श्राप दे दिया कि वह जीवन भर प्रेत योनि में भटकेगी।
श्राप के प्रभाव से मंजुघोषा अत्यंत दुखी और भयभीत हो गई और उसने मेघवी से क्षमा याचना की। उसकी दयनीय स्थिति देखकर मेघवी का हृदय द्रवित हो गया और उन्हें अपने क्रोध पर भी पश्चाताप हुआ। तब उन्होंने मंजुघोषा को पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने और भगवान विष्णु की आराधना करने की सलाह दी, ताकि वह इस श्राप से मुक्त हो सके।
मंजुघोषा ने श्रद्धा और विश्वास के साथ पापमोचिनी एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की कृपा से वह श्राप से मुक्त हो गई। इसके बाद मेघवी ने भी अपने जीवन के सभी पापों से मुक्ति पाने के लिए यही व्रत किया। पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से उनकी खोई हुई तपस्या शक्ति पुनः लौट आई और वे फिर से धर्म और साधना के मार्ग पर अग्रसर हो सके।
इस प्रकार यह कथा यह संदेश देती है कि चाहे व्यक्ति कितना ही पथभ्रष्ट क्यों न हो जाए, यदि वह सच्चे मन से पश्चाताप कर भगवान की शरण में जाता है, तो उसे अवश्य ही पापों से मुक्ति और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
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