Mahashivratri 2026|भगवान शिव जी क्यों पसंद नहीं करते इस फूल को| क्यों वरजीत है उनकी पूजा में ये फूल

Mahashivratri 2026: पौराणिक मान्यताओं में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक समय भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि दोनों में से श्रेष्ठ कौन है। दोनों देवताओं के मध्य यह विवाद इतना बढ़ गया कि उसकी परिणति एक अद्भुत दिव्य घटना के रूप में सामने आई। उसी क्षण उनके समक्ष भगवान शिव एक अनंत अग्नि स्तंभ, अर्थात दिव्य ज्योति के रूप में प्रकट हुए। यह ज्योति स्तंभ इतना विशाल और अनंत था कि उसका न आदि स्पष्ट था और न ही अंत।

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महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ शिव आराधना करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। पूजा-अर्चना के दौरान विभिन्न प्रकार के पुष्प और पूजन सामग्री का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव को कुछ विशेष पुष्प अत्यंत प्रिय हैं, जबकि कुछ ऐसे भी पुष्प हैं जिन्हें अर्पित करना वर्जित माना गया है। केतकी का फूल भी उन्हीं में से एक है, जिसे शिव पूजा में चढ़ाने की मनाही है। इसके पीछे यही पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है।

कथा के अनुसार जब भगवान शिव अनंत अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए, तब उन्होंने भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा से कहा कि जो इस दिव्य ज्योति का आदि या अंत खोज लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। यह एक प्रकार की परीक्षा थी, जिसमें दोनों देवताओं को अपनी सामर्थ्य सिद्ध करनी थी। भगवान विष्णु उस ज्योति स्तंभ का अंत खोजने के लिए नीचे की दिशा में प्रस्थान कर गए, जबकि भगवान ब्रह्मा उसका आदि खोजने के लिए ऊपर की ओर चल पड़े।

दोनों देवता अपने-अपने मार्ग पर लंबे समय तक प्रयास करते रहे, किंतु वह अग्नि स्तंभ इतना अनंत था कि उसकी सीमा का कोई बोध नहीं हो पाया। काफी प्रयासों के बाद भगवान विष्णु को यह अनुभव हुआ कि वे उस दिव्य ज्योति का अंत खोजने में असमर्थ हैं। वे लौटकर भगवान शिव के समक्ष उपस्थित हुए और विनम्रता के साथ अपनी असफलता स्वीकार कर ली। उनकी यह सत्यनिष्ठा उनके विनम्र स्वभाव को दर्शाती है।

दूसरी ओर भगवान ब्रह्मा भी उस ज्योति स्तंभ का आदि नहीं खोज सके। जब वे ऊपर की दिशा में आगे बढ़ रहे थे, तभी उन्हें केतकी का एक फूल दिखाई दिया, जो उस अग्नि स्तंभ से नीचे गिरता हुआ प्रतीत हो रहा था। उसी क्षण उनके मन में एक विचार आया। उन्होंने केतकी के फूल से आग्रह किया कि वह उनके पक्ष में झूठी गवाही दे और यह प्रमाणित करे कि उन्होंने उस ज्योति स्तंभ का आदि खोज लिया है। केतकी का फूल उनके साथ आने के लिए तैयार हो गया।

भगवान ब्रह्मा केतकी के फूल को साक्षी बनाकर भगवान शिव के समक्ष लौटे और उन्होंने दावा किया कि वे उस दिव्य ज्योति का आदि खोजने में सफल हो गए हैं। उन्होंने केतकी को इस कथन का प्रमाण प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने सत्य को छिपाकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया।

भगवान शिव हुए नाराज

जब भगवान शिव को वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्हें यह पता चला कि भगवान ब्रह्मा ने असत्य का सहारा लिया है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। सत्य के प्रतिरूप माने जाने वाले शिव के लिए यह आचरण अस्वीकार्य था। उन्होंने भगवान ब्रह्मा के इस छल से अप्रसन्न होकर उनका एक सिर काट दिया। यह दंड असत्य और अहंकार के परिणाम का प्रतीक था।

केवल इतना ही नहीं, भगवान शिव ने केतकी के फूल को भी श्राप दिया। उन्होंने कहा कि भविष्य में केतकी का फूल उनकी पूजा में कभी अर्पित नहीं किया जाएगा। इस श्राप के कारण शिव आराधना में केतकी के प्रयोग को वर्जित माना जाने लगा। तब से लेकर आज तक शिव पूजा में केतकी का फूल नहीं चढ़ाया जाता।

यह कथा सत्य, विनम्रता और धर्म के महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। जहां भगवान विष्णु ने अपनी असफलता को स्वीकार कर सत्य का पालन किया, वहीं भगवान ब्रह्मा ने असत्य का सहारा लेकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया, जिसका परिणाम उन्हें दंड के रूप में भुगतना पड़ा। केतकी का फूल भी इस असत्य का सहभागी बना और उसे भी श्राप का भागी बनना पड़ा।

महाशिवरात्रि जैसे पावन अवसर पर इस कथा का स्मरण भक्तों को यह संदेश देता है कि पूजा में केवल विधि-विधान ही नहीं, बल्कि सत्य और निष्कपट भाव भी आवश्यक है। भगवान शिव की आराधना में पवित्रता और ईमानदारी का विशेष महत्व है। यही कारण है कि केतकी का फूल आज भी शिव पूजा में अर्पित नहीं किया जाता और यह कथा श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक शिक्षा के रूप में मानी जाती है।

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