Garuda Purana| गरुड़ पुराण के अनुसार इन लोगो के घर भोजन करने से उठाना पड़ सकता है भारी कष्ट

Garuda Purana: सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में गरुड़ पुराण को जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक नियमों का मार्गदर्शक माना गया है। इसमें केवल मृत्यु और परलोक की ही नहीं, बल्कि सांसारिक जीवन को संतुलित और शुद्ध रखने के नियमों की भी विस्तृत व्याख्या मिलती है। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य का आचरण, उसकी संगति और उसका भोजन, तीनों उसके भाग्य और स्वभाव को गहराई से प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि इस ग्रंथ में यह भी बताया गया है कि हर स्थान और हर व्यक्ति के हाथ का भोजन ग्रहण करना उचित नहीं होता। गलत व्यक्ति के घर का अन्न व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता, मानसिक अस्थिरता और दुर्भाग्य को बढ़ा सकता है।

Photo Credit: AI Generated, Garuda Purana

अन्न केवल भोजन नहीं, चेतना का स्रोत भी है

शास्त्रों में कहा गया है कि अन्न से मन बनता है और मन से विचार, फिर वही विचार कर्म का रूप लेते हैं। अर्थात जो हम खाते हैं, उसका सीधा प्रभाव हमारे सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ता है। यदि भोजन शुद्ध, प्रेमपूर्वक और सद्भावना से कमाया गया हो, तो वह शरीर के साथ-साथ मन को भी शुद्ध करता है। इसके विपरीत यदि भोजन पाप, छल या दूसरों के कष्ट से प्राप्त धन से बना हो, तो वह धीरे-धीरे व्यक्ति के स्वभाव को भी दूषित कर देता है। इसी सिद्धांत के आधार पर गरुड़ पुराण कुछ विशेष प्रकार के लोगों के घर भोजन करने से बचने की सलाह देता है।

अधर्म की कमाई से बना भोजन क्यों अशुभ माना गया है

गरुड़ पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अपराध, चोरी, धोखाधड़ी या किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्यों से धन अर्जित करता है, उसके घर का भोजन ग्रहण करना आत्मिक दृष्टि से हानिकारक माना जाता है। ऐसे धन में नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक अशांति समाहित रहती है। जब कोई व्यक्ति ऐसा अन्न ग्रहण करता है, तो अनजाने में वह उसी नकारात्मक प्रवृत्ति से प्रभावित होने लगता है। धीरे-धीरे उसके निर्णयों में भ्रम, मन में असंतोष और जीवन में बाधाएं बढ़ने लगती हैं। शास्त्रों में इसे कर्मों के सूक्ष्म आदान-प्रदान के रूप में देखा गया है, जहां भोजन के माध्यम से भी संस्कार स्थानांतरित होते हैं।

दूसरों के दुख से कमाए धन का भोजन क्यों मन को अशांत करता है

गरुड़ पुराण में उन लोगों के भोजन से भी सावधान रहने को कहा गया है जो दूसरों की मजबूरी का लाभ उठाकर अत्यधिक लाभ कमाते हैं। ऐसे व्यक्तियों की कमाई में किसी का दर्द, किसी का शोषण और किसी की पीड़ा छिपी होती है। जब इस प्रकार की कमाई से बना भोजन ग्रहण किया जाता है, तो वह व्यक्ति के भीतर अनजाने में बेचैनी, असंतोष और चिड़चिड़ेपन को बढ़ा सकता है। यह केवल धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक सत्य भी है कि अन्याय से जुड़ी वस्तुएं अंततः मानसिक अशांति का कारण बनती हैं।

नकारात्मक मानसिक अवस्था में बनाया गया भोजन क्यों प्रभाव डालता है

गरुड़ पुराण में यह भी संकेत मिलता है कि अत्यधिक क्रोध, द्वेष या कटुता से ग्रस्त व्यक्ति के हाथों बना भोजन खाने से व्यक्ति के स्वभाव में भी वही गुण बढ़ सकते हैं। शास्त्रों में भोजन को तीन गुणों में बांटा गया है, सात्विक, राजसिक और तामसिक। जब भोजन अशांत मन से बनाया जाता है, तो उसमें तामसिक गुण अधिक हो जाते हैं, जो आलस्य, क्रोध और भ्रम को जन्म देते हैं। ऐसे भोजन का नियमित सेवन व्यक्ति के व्यवहार में अस्थिरता और नकारात्मकता ला सकता है, जिससे जीवन के कई क्षेत्रों में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।

संगति के साथ भोजन का प्रभाव भी जीवन को दिशा देता है

गरुड़ पुराण केवल भोजन की नहीं बल्कि संगति की भी शुद्धता पर बल देता है। जिन व्यक्तियों का आचरण, चरित्र और सोच नकारात्मक होती है, उनके साथ बैठकर भोजन करना भी मानसिक स्तर पर प्रभाव डालता है। चरित्रहीनता, छल और स्वार्थ से भरी जीवनशैली का प्रभाव केवल व्यवहार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सूक्ष्म रूप से दूसरों के मन पर भी पड़ता है। इसलिए शास्त्र यह समझाते हैं कि जहां वातावरण शुद्ध, शांत और सकारात्मक हो, वहीं भोजन करना आत्मिक उन्नति के लिए सहायक होता है।

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का भी जुड़ा है संबंध

गरुड़ पुराण की शिक्षाएं केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन से भी जुड़ी हैं। इसमें यह भी संकेत मिलता है कि गंभीर रूप से अस्वस्थ या संक्रामक रोगों से पीड़ित व्यक्ति के घर भोजन करने से बचना चाहिए। यह बात आज के विज्ञान से भी मेल खाती है कि संक्रमण फैलने की संभावना रहती है। इस प्रकार शास्त्र स्वास्थ्य सुरक्षा को भी धर्म का ही एक भाग मानते हैं। भोजन का स्थान, व्यक्ति और वातावरण तीनों का शुद्ध होना शरीर और मन दोनों के लिए आवश्यक बताया गया है।

करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा भोजन का प्रभाव

गरुड़ पुराण में यह भी भाव मिलता है कि जो लोग समाज में हिंसा, नशा या दूसरों के शोषण से जुड़े कार्यों से आजीविका चलाते हैं, उनके घर का अन्न व्यक्ति के पुण्य कर्मों को क्षीण कर सकता है। ऐसे व्यवसायों से न केवल समाज को हानि होती है बल्कि उनमें करुणा और संवेदना का भी अभाव होता है। जब कोई व्यक्ति ऐसे वातावरण से आया भोजन ग्रहण करता है, तो वह अनजाने में उसी नकारात्मक प्रवाह का हिस्सा बन जाता है, जिससे उसकी आत्मिक प्रगति बाधित हो सकती है।

शुद्ध भोजन से बनता है सकारात्मक जीवन मार्ग

गरुड़ पुराण का मूल संदेश यह नहीं है कि समाज से दूरी बनाई जाए, बल्कि यह कि व्यक्ति अपने जीवन में जागरूकता रखे। शुद्ध आचरण, ईमानदार कमाई और प्रेमपूर्वक परोसा गया भोजन व्यक्ति के मन में संतोष, शांति और स्थिरता लाता है। जब मन शांत होता है, तो निर्णय भी सही होते हैं और कर्म भी शुभ दिशा में जाते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में अन्न को ब्रह्म के समान माना गया है और उसे अत्यंत सम्मान देने की परंपरा रही है।

गरुड़ पुराण की सीख से जीवन में कैसे आए संतुलन

यदि गरुड़ पुराण की इन शिक्षाओं को केवल धार्मिक नियम न मानकर जीवन शैली के रूप में अपनाया जाए, तो व्यक्ति अपने जीवन में कई अनचाही परेशानियों से बच सकता है। सही संगति, शुद्ध भोजन और सकारात्मक वातावरण न केवल मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं, बल्कि भाग्य को भी अनुकूल दिशा में मोड़ते हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गरुड़ पुराण का यह संदेश आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन काल में था।

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