Ekadashi Fact| एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है, फिर क्यों जगन्नाथ पुरी में एकादशी के दिन भी मिलता है चावल का महाप्रसाद

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है। यह दिन भगवान विष्णु की आराधना के लिए समर्पित है और इसे मोक्ष प्रदान करने वाली तिथि के रूप में स्वीकार किया जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक एकादशी का व्रत करता है, उसे आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ पापों से मुक्ति भी प्राप्त होती है। वर्ष भर में कुल चौबीस एकादशी आती हैं, और प्रत्येक एकादशी का अपना विशिष्ट महत्व होता है।

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एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, मन की शुद्धि और ईश्वर के प्रति समर्पण का अवसर भी है। इस दिन भक्त अपने आहार-विहार पर विशेष ध्यान देते हैं और सांसारिक व्यस्तताओं से हटकर भक्ति में लीन होने का प्रयास करते हैं। व्रत के नियमों का पालन करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक भी है।

इसी अनुशासन के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण नियम है—एकादशी के दिन चावल का सेवन न करना। यह नियम लगभग सभी स्थानों पर प्रचलित है और इसे व्रत की शुद्धता से जोड़ा जाता है। हालांकि, इस नियम का अपवाद एक स्थान पर देखने को मिलता है—जगन्नाथ पुरी। यहाँ एकादशी के दिन चावल का महाप्रसाद दिया जाता है। यही तथ्य अनेक श्रद्धालुओं के मन में प्रश्न उत्पन्न करता है कि जब भगवान विष्णु स्वयं मोक्षदाता हैं, तो उनकी ही नगरी में यह भिन्न परंपरा क्यों है। इस प्रश्न का उत्तर एक रोचक और भावनात्मक कथा में निहित है, जिसे समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि सामान्यतः एकादशी पर चावल क्यों वर्जित माने गए हैं।

एकादशी पर चावल खाना मना क्यों है?

एकादशी के दिन चावल का सेवन न करने की परंपरा के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों प्रकार के कारण बताए जाते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से माना जाता है कि चावल में जल तत्व की मात्रा अत्यधिक होती है और यह तामसिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है। एकादशी व्रत का उद्देश्य मन और शरीर को सात्त्विक बनाना है, ताकि साधक की चेतना शुद्ध रहे और वह भगवान विष्णु की उपासना में पूर्ण एकाग्रता प्राप्त कर सके।

चावल में अधिक जल तत्व होने के कारण इसे अपेक्षाकृत भारी भोजन माना जाता है। यह शरीर में आलस्य और जड़ता उत्पन्न कर सकता है। व्रत के दिन साधारण, हल्का और सात्त्विक आहार ग्रहण करने की परंपरा इसलिए है ताकि शरीर सहज और मन स्थिर बना रहे। जब शरीर हल्का रहता है, तो ध्यान और भक्ति में मन अधिक केंद्रित हो पाता है। इस प्रकार चावल का त्याग केवल आहार संबंधी नियम नहीं, बल्कि साधना को प्रभावी बनाने का एक माध्यम भी है।

इसके अतिरिक्त एक पौराणिक कथा भी इस निषेध के पीछे बताई जाती है। मान्यता है कि चावल की उत्पत्ति महर्षि मेधा के शरीर के अंश से हुई थी। कहा जाता है कि महर्षि मेधा ने एकादशी के दिन अपने प्राण त्यागे थे। उनके शरीर का अंश पृथ्वी में विलीन हो गया और उसी से चावल तथा जौ की उत्पत्ति हुई। इस कारण एकादशी के दिन चावल को जीव या मांस के समान अशुद्ध माना जाता है।

यह विश्वास प्रचलित है कि यदि कोई व्यक्ति एकादशी के दिन चावल का सेवन करता है, तो उसके व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। इसीलिए इस तिथि पर चावल को वर्जित माना गया है। यहाँ यह स्पष्ट होता है कि एकादशी पर चावल का त्याग केवल परंपरा का पालन नहीं, बल्कि श्रद्धा और मान्यता का विषय है, जिसे व्रत की पवित्रता से जोड़ा गया है।

जगन्नाथ पुरी में आज भी क्यों उल्टी लटकी है एकादशी?

जहाँ एक ओर समस्त भारत में एकादशी के दिन चावल न खाने का नियम मान्य है, वहीं जगन्नाथ मंदिर में इस तिथि पर चावल का महाप्रसाद वितरित किया जाता है। इस परंपरा को कई लोग ‘उल्टी एकादशी’ के नाम से जानते हैं। यहाँ एकादशी के दिन भगवान जगन्नाथ को विशेष रूप से चावल का भोग लगाया जाता है और वही महाप्रसाद श्रद्धालुओं को प्रदान किया जाता है।

इस विशिष्ट परंपरा के पीछे एक अत्यंत रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद ग्रहण करने पुरी पधारे। वे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से मंदिर पहुँचे, परंतु उस समय तक भोग समाप्त हो चुका था। केवल एक पत्ते पर कुछ बासी चावल के दाने शेष रह गए थे, जिन्हें एक कुत्ता चाट रहा था।

ब्रह्मा जी ने उस दृश्य को देखकर तनिक भी संकोच नहीं किया। उन्होंने भक्तिभाव से उसी कुत्ते के साथ बैठकर वे चावल ग्रहण कर लिए। उनके लिए महाप्रसाद की पवित्रता सर्वोपरि थी; स्थान, परिस्थिति या बाहरी स्थिति का कोई महत्व नहीं था। उसी समय देवी एकादशी वहाँ प्रकट हुईं। उन्होंने ब्रह्मा जी को नियमों के उल्लंघन का स्मरण कराया और इसे अनुचित बताया।

तभी भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने देवी एकादशी से कहा कि जहाँ सच्ची और निष्कपट भक्ति हो, वहाँ किसी नियम का बंधन लागू नहीं होता। भगवान के लिए भक्त की भावना ही सर्वोपरि है। उन्होंने घोषणा की कि उस दिन से एकादशी के अवसर पर उनके महाप्रसाद में चावल ही पकाया जाएगा और इस स्थान पर एकादशी के दिन चावल न खाने का नियम लागू नहीं होगा।

कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ एकादशी से इतने कुपित हुए कि उन्होंने उन्हें मंदिर के पीछे उल्टा लटका दिया। तभी से यह मान्यता प्रचलित हो गई कि पुरी में एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित नहीं है। यहाँ चावल को महाप्रसाद के रूप में श्रद्धा और सम्मान के साथ ग्रहण किया जाता है।

इस कथा का सार यह है कि भक्ति में नियमों का महत्व अवश्य है, परंतु सच्ची भावना और समर्पण उससे भी ऊपर हैं। भगवान जगन्नाथ की यह परंपरा दर्शाती है कि ईश्वर के निकट भावनात्मक पवित्रता ही सर्वोच्च है।

इस प्रकार एकादशी पर चावल न खाने की परंपरा जहाँ धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं से जुड़ी है, वहीं जगन्नाथ पुरी की परंपरा यह संदेश देती है कि नियमों से भी अधिक महत्व भक्ति और श्रद्धा का है। दोनों ही दृष्टिकोण अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं और भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता और गहराई को दर्शाते हैं।

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